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मुक्त करने के लिये जो भी कर सकते हैं, करना होगा। सरकार यदि हमारी मदद नहीं करती, तो उसे कम से कम हमारे इस न्यायपूर्ण प्रयास में बाधा नहीं पहुंचानी चाहिये। हमें यह कहने का कोई फायदा नहीं कि हमें विभिन्न वर्गोंं तथा समुदायों के बीच द्वेष-भावना पैदा नहीं करनी चाहिये। सरकार की यह अपील सभी समुदायों से होनी चाहिए न कि अकेले हमसे। यह अपील विशेष रूप से उन समुदायों से की जानी चाहिए जो गलत हैं और जो इस मामले में पाप कर रहे हैं।
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“मेरे लोगों को मेरी आवश्यकता नहीं”
आप इसका अनुवाद इश्तहारों में प्रकाशित कर सकते हैं और उन्हें अपने लोगों के बीच प्रसारित कर सकते हैं। मैं मुखेड़ में अपने और उच्च जाति के लोगों के बीच संघर्ष के संबंध में तार पढ़ता रहा हूँ। मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि हमारे लोग हर कीमत पर इस लड़ाई को सफलता तक पहुँचाने के लिये पूरी तरह से तैयार हैं। मैं उन्हें इस महान संकल्प पर बधाई देता हूँ। पता चला है कि आप लोग 5 नवम्बर को सत्याग्रह शुरू कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आपने अच्छी तरह से तैयारियाँ कर ली होंगी। मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारी सहायता के लिये वहाँ नहीं हूँ। लेकिन मुझे मालूम है कि हमारे लोग अब अपनी समस्याएंँ समझ गये हैं और उन्हें हर वक्त मेरी जरूरत नहीं है- ए.पी.” ख्1,
नासिक में सत्याग्रह के दौरान मौजूदा स्थिति को टाइम्स ऑफ इंडिया में इस तरह बताया गया : संपादक
“पवित्र कुंडों में स्नान का अधिकार नहीं
नासिक में अस्पृश्यों के विरुद्ध फैसला
(हमारे संवाददाता द्वारा)
नासिक 6 जून, 1932
कुल मिलाकर मेरा मानना है कि अस्पृश्यों को न तो चार कुंडों (नहाने के तालाब) पर जाने का अधिकार है और न ही उनमें नहाने का। इसलिये, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 147 (3) के तहत मैं सभी महारों, मंगों, चमारों, धेड़ों, भंगियों तथा अन्य अस्पृश्यों को लक्ष्मण, धानुष्य, राम तथा सीता कुंडों में जाने तथा उनमें स्नान करने के उनके कथित अधिकार का प्रयोग करने से मना करता हूँ, जब तक कि वे सिविल कोर्ट से आदेश न प्राप्त कर लें, जिसके तहत उन्हें इन कुंडों में स्नान का अधिकार
- द बॉम्बे क्रॉनिकल, 3 नवम्बर, 1931।