186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दिया गया हो।’ यह कहना है नासिक के जिला मजिस्ट्रेट श्री एल.एन. ब्राउन का, जो उन्होंने सनातनियों और अस्पृश्यों के बीच, पवित्र कुंडों में जाने और उनमें स्नान करने के अस्पृश्यों के अधिकार को लेकर, चल रहे विवाद पर बैठाई गई जाँच के संबंध में आज पास किये गये एक आदेश के तहत कहा।
राम कुंड के निकट स्थित आयरिश ब्रिज संधवा के संबंध में मजिस्ट्रेट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह संधवा तीर्थयात्रियों द्वारा पवित्र कंडों की प्रदक्षिणा करने के लिये प्रयोग किया जाता रहा है। आम रास्ते के रूप में इसका प्रयोग गौण है। मेरा मानना है कि प्राप्त साक्ष्यों से न्यायसंगत आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्मानजनक पोशाक पहने ईसाइयों तथा मुसलमानों को इससे गुजरने की अनुमति है। लेकिन यह साक्ष्य कड़े तौर पर वर्तमान मामले में संगत नहीं हैं, जो कि अस्पृश्य हिन्दुओं के अधिकार के विषय में है। यह साबित नहीं किया गया है कि अस्पृश्य हिन्दुओं को यह संधवा प्रयोग करने का कोई अधिकार है। ख्1,
जब मंदिर-प्रवेश सत्याग्रह चल रहा था तो मंदिर-प्रवेश को सरकार द्वारा वैध करार दिये जाने के लिये एक आंदोलन चलाया गया। इस मुद्दे की पृष्ठभूमि इस प्रकार हैः-
भारत में मंदिर-प्रवेश आंदोलन को गहरा आघात पहुँचा, जब अदालतों ने कहा कि अस्पृश्यों द्वारा मंदिरों में प्रवेश किया जाना अवैध है, क्योंकि यह प्रचलित रीति-रिवाजों के विरुद्ध है। इस तरह की कानूनी घोषणा महात्मा गांधी द्वारा किये जा रहे समाज सुधार प्रयासों की राह में रोड़े अटकाने जैसी थी। इस पृष्ठभूमि में इस बात के प्रयास चल रहे थे कि इस बाधा को दूर करने हेतु विधान तैयार किया जाये, इसलिये केन्द्रीय विधानमंडल तथा प्रांतीय विधानमंडलों में कई विधेयक पेश किये जाने वाले थे। उपरोक्त विधेयकों में से सबसे अधिक महत्वपूर्ण डॉ. सुब्बारॉयन का मंदिर-प्रवेश विधेयक और रंगा अय्यर का अस्पृश्यता उन्मूलन विधेयक थे।
डॉ. सुब्बारॉयन के मंदिर प्रवेश विधेयक का उद्देश्य अदालतों द्वारा की गई गलती को सुधारना और मद्रास धार्मिक विन्यास (ऐन्डॉमेंट) अधिनियम में संशोधन करना था। हालांकि, यह विधेयक सनातन हिन्दुओं, जिनमें से प्रमुख पंडित मदनमोहन मालवीय, कोंडा वेंकटप्पय्या एस.टी. रामानुज आयंगर और श्रीनिवास आयंगर थे, द्वारा अनुमोदित था। हालांकि, डॉ. सुब्बारॉयन के मंदिर-प्रवेश विधेयक को मद्रास परिषद में पेश करने के लिये इस आधार पर अनुमति देने से इनकार कर दिया गया कि यह बहुत व्यापक है और कोई प्रांतीय विधानमंडल इसका अधिनियमन नहीं कर सकता। इसके बाद, डॉ. सुब्बारॉयन के विधेयक के आधार पर रंगा अय्यर ने दूसरा विधेयक तैयार किया,
- द टाइम्स ऑफ इंडिया, 7-6-1932, पुनः मुद्रित, खैरमोर खंड 3, पृष्ठ 351-352।