खण्ड - IV कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह, नासिक और मन्दिर प्रवेश आन्दोलन - Page 205

188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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14 फरवरी, 1933

“मंदिर प्रवेश के लिये इस आंदोलन पर अस्पृश्यों का क्या रवैया था? श्री गांधी द्वारा मुझे मंदिर प्रवेश आंदोलन को अपना समर्थन के लिये कहा गया। मैंने ऐसा करने से मना कर दिया और इस विषय पर प्रेस में एक वक्तव्य जारी किया। क्योंकि इससे पाठकों को इस प्रश्न पर मेरे रवैये का आधार समझने में मदद मिलेगी, अतः मैंने इसे विस्तार से प्रस्तुत करना उचित समझा। यह इस प्रकार है।

यद्यपि मंदिर प्रवेश से संबंधित विवाद सनातनियों तथा महात्मा गांधी तक सीमित है, तथापि दलित वर्गों की निस्संदेह इसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि जब यह मुददा अंतिम निर्णय के लिये सामने आयेगा तब उनकी स्थिति इस मुद्दे को किसी भी तरफ ले जा सकती है। इसलिये यह जरूरी है कि उनका दृष्टिकोण परिभाषित और व्यक्त किया जाये, जिससे इस विषय पर कोई अस्पष्टता बाकी न रहे।

जो मंदिर प्रवेश विध्ेयक श्री रंगा ने अब तैयार किया है, उसको संभवतः दलित वर्ग अपना समर्थन नहीं दे सकता। इस विधेयक का मूल तत्व यह है कि यदि किसी मंदिर विशेष के आसपास के नगरपालिका और स्थानीय बोर्ड के मतदाता जनमत संग्रह के आधार पर यह तय करते हैं कि दलित वर्गों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति होनी चाहिये तो उस मंदिर के ट्रस्टी या प्रबध्ांक इस निर्णय को लागू करेंगे। यह सिद्धांत बहुमत का साधारण सिद्धांत है और इस विधेयक में कुछ भी महत्वपूर्ण या क्रांतिकारी नहीं है और यदि सनातनी समझदार होते तो इसको बिना आपत्ति के स्वीकार कर लेते।

दलित वर्ग इस सिद्धांत पर आधारित किसी विधेयक को दो कारणों से अपना समर्थन नहीं दे सकते : एक कारण तो यह है कि इस विधेयक से वह दिन किसी भी प्रकार से जल्दी नहीं आने वाला जब दलित वर्ग को मंदिर में प्रवेश की अनुमति होगी। यह सत्य है कि विधेयक के तहत अल्पसंख्यकों को उन ट्रस्टी या प्रबंधक के विरुद्ध आज्ञा-पत्र प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा, जो बहुमत के निर्णय के आधार पर दलित वर्गों के लिये मंदिर के द्वार खोलेगा। लेकिन विधेयक की इस धारा से संतुष्ट होने और विधेयक के लेखक को बधाई देने से पहले, सर्वप्रथम इस बात का आश्वासन मिलना चाहिये कि जब इस मामले में मतदान होगा, तो बहुमत दलितों को मंदिर-प्रवेश की अनुमति देने के पक्ष में होगा। यदि किसी को कोई भ्रम न हो तो, यह बात हर कोई स्वीकार करेगा कि मंदिर-प्रवेश के पक्ष में बहुमत मिलने की उम्मीद पूरी होने की संभावना यदि कुछ है भी तो, बहुत ही कम है। एक तथ्य