खण्ड - IV कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह, नासिक और मन्दिर प्रवेश आन्दोलन - Page 206

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जो कि शंकराचार्य के साथ हुये पत्र-व्यवहार में इस विधेयक के लेखक द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया है। वह है कि आज बहुत निश्चित रूप से इसके विरुद्ध है।

ऐसी कौन सी स्थिति विधेयक के पारित होने के बाद पैदा हो जायेगी, जिससे कोई उम्मीद कर सके कि बहुमत मंदिर प्रवेश के पक्ष में रहेगा। मेरी समझ से कोई नहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुझे गुरूवायूर मंदिर के संबंध में हुए मत संग्रह का परिणाम याद रखना चाहिये, लेकिन मैं ऐसे बहुमत संग्रह को सामान्य परिणाम के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता, जो महात्मा गांधी के जीवन से इतना अधिक प्रभावित हो। इस तरह की किसी भी गणना से पहले गांधी जी का प्रभाव हटा दिया जाना चाहिये।

दूसरे, यह विधेयक मंदिरों में अस्पृश्यता को कोई पापपूर्ण रिवाज नहीं समझता। यह अस्पृश्यता को केवल एक सामाजिक बुराई मानता है, जो किसी अन्य तरह की सामाजिक बुराई के समान ही है। क्योंकि, यह स्वयं अस्पृश्यता को अवैध घोषित नहीं करता। इसका बाध्यकारी बल तभी समाप्त होता है, यदि बहुमत ऐसा फैसला दे। पाप या अनैतिकता को केवल इसलिये बर्दाश्त नहीं किया जा सकता कि अधिकांश लोगांं को इसकी लत है या अधिकांश लोग इसे व्यवहार में लाना चाहते हैं। यदि अस्पृश्यता एक पापपूर्ण और अनैतिक रिवाज है, तो दलित वर्गों की नजर में इसे बिना किसी संकोच के नष्ट कर दिया जाना चाहिए, चाहे बहुमत को यह स्वीकार्य हो। यही वह तरीका है, जिससे अदालत अन्य सभी रीति-रिवाजों से निबटती है, अगर उसे लगता है कि वे रीति-रिवाज अनैतिक और सार्वजनिक नीति के विरुद्ध हैं।

यह विधेयक ऐसा नहीं करता। इस विधेयक के लेखक का दृष्टिकोण अस्पृश्यता के प्रचलन के प्रति केवल उतना ही गंभीर है, जितना कि शराब छुड़ाने वाले का शराब पीने की आदत के प्रति होता है। वास्तव में, इन दोनों के बीच कल्पित समानता से वह इतना प्रभावित है कि उसने तरीका भी वही अपनाया है जिसकी वकालत मद्यपान छुड़ाने वालों द्वारा पीने की इस बुरी आदत को छुड़ाने के लिये की जाती है, अर्थात् स्थानीय विकल्प के द्वारा। दलित वर्गों के ऐसे मित्र के प्रति अधिक कृतज्ञता महसूस नहीं होती, जो अस्पृश्यता को शराब पीने की आदत से ज्यादा बुरा नहीं समझता। यदि श्री रंगा अय्यर यह नहीं भूले होते कि अभी कुछ ही महीने पहले श्री गांधी ने स्वयं को आमरण अनशन के लिये तैयार कर लिया था, यदि अस्पृश्यता नहीं मिटाई जाती है, तो उन्होंने इस अभिशाप के प्रति अधिक गंभीर दृष्टिकोण अपनाया होता और अस्पृश्यता के संपूर्ण उन्मूलन के लिये कोई बेहद व्यापक सुधार प्रस्तावित किया होता। प्रभावपूर्णता की दृष्टि से इस विधेयक में चाहे जो भी कमियाँ हों, दलित वर्ग इस विधेयक से कम से कम इतनी उम्मीद करते हैं कि यह इस सिद्धांत को मान्यता दे कि अस्पृश्यता एक पाप है।