190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मैं वास्तव में नहीं समझ पा रहा हूँ कि महात्मा गांधी इस विधेयक से कैसे संतुष्ट हैं, जो हमेशा से ही इस बात पर दृढ़ रहे हैं कि अस्पृश्यता एक पाप है! यह विधेयक निश्चित तौर पर दलित वर्गों को तो संतुष्ट नहीं करता। यह प्रश्न कि यह विधेयक अच्छा है या बुरा है, पर्याप्त है या अपर्याप्त है- एक गौण प्रश्न है।
मुख्य प्रश्न यह है : दलित वर्ग मंदिरों में प्रवेश का अधिकार चाहते हैं या नहीं? इस मुख्य प्रश्न पर दलित वर्गों द्वारा दो नजरियों से विचार किया जा रहा है। पहला भौतिकतावादी दृष्टिकोण है। इससे शुरुआत करें तो, दलित वर्ग सोचते हैं कि उनके उत्थान का सुनिश्चित रास्ता उच्च शिक्षा, अधिक रोजगार और आजीविका कमाने के बेहतर तरीके हैं। एक बार जब वे सामाजिक जीवन के पैमाने पर सही स्तर पर आ जायेंगे, तो वे सम्मान्नीय हो जायेंगे और जब वे सम्माननीय हो जायेंगे, तब उनके प्रति रूढि़वादियों के धार्मिक दृष्टिकोण में निश्चित रूप से परिवर्तन आयेगा और यदि ऐसा नहीं भी होता है, तो भी उनके भौतिकतावादी हितों का इससे कोई नुकसान नहीं हो सकता। इस स्तर पर पहुँचकर दलित वर्ग कह सकते हैं कि हम अपने संसाधन मंदिर प्रवेश जैसी थोथी चीजों पर खर्च करें। एक अन्य कारण भी है कि वे इसके लिये क्यों नहीं लड़ना चाहते। यह तर्क आत्म-सम्मान का तर्क है।
ज्यादा समय नहीं हुआ है जब भारत में यूरोपियों द्वारा चलाये जाने वाले क्लबों और अन्य सामाजिक विश्राम-गृहों के दरवाज़ों पर बोर्ड लगे होते थे “कुत्तों और भारतीयों’’ को आने की अनुमति नहीं है। आज हिन्दुओं के मंदिरों पर वही बोर्ड लगे होते हैं, अंतर सिर्फ इतना है कि हिन्दू मंदिरों के बोर्ड पर लिखा होता है,” सभी हिन्दू तथा कुत्तों सहित, सभी जानवर आ सकते हैं, केवल अस्पृश्यों को आने की अनुमति नहीं है।” स्थिति दोनों ही मामलों में एक-सी है। लेकिन हिन्दुओं ने कभी उन स्थानों पर प्रवेश पाने के लिये विनती नहीं की, जिनसे यूरोपियों ने अपने अंहकार की वजह से उन्हें बाहर कर रखा था। तो फिर अस्पृश्य ऐसे स्थानों पर प्रवेश पाने के लिये क्यों मिन्नत करें, जिनसे हिन्दुओं ने अपने अहंकार के कारण उन्हें दूर रखा हुआ है? यह उस दलित वर्ग के व्यक्ति का तर्क है, जिसकी दिलचस्पी अपने भौतिक कल्याण में है। वह हिन्दुओं से यह कहने के लिये तैयार है कि “मंदिर खोलने हैं या नहीं खोलने हैं, यह तुम्हारे लिये विचार करने का प्रश्न है, मेरे लिये संघर्ष करने का नहीं।” यदि आपको लगता है कि मानव व्यक्तित्व की पवित्रता का सम्मान न करना शिष्टाचार के खिलाफ है, तो अपने मंदिर खोल दीजिये और भद्रजन बन जाइये। यदि आपको भद्रजन बनने की बजाय एक हिन्दू कहलाना ज्यादा पसंद हो तो अपने मंदिरों के द्वार बंद कर दो और भाड़ में जाओ, क्योंकि मुझे मंदिर में आने की कोई परवाह नहीं।”