खण्ड - IV कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह, नासिक और मन्दिर प्रवेश आन्दोलन - Page 208

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मुझे यह तर्क इसी रूप में रखना जरूरी लगा, क्योंकि मैं पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे व्यक्तियों के दिमाग़ से यह भ्रम मिटाना चाहता हूँ कि दलित वर्ग बड़ी उम्मीद से अपना संरक्षण पाने का इंतजार कर रहे हैं।

दूसरा नज़रिया आध्यात्मिक है। धार्मिक प्रवृत्ति के होने के नाते, दलित वर्गों के लोग मंदिर में प्रवेश की अनुमति चाहते हैं या नहीं? प्रश्न यह है कि आध्यात्मिक नजरियों से, वे मंदिर प्रवेश के प्रति उतने उदासीन नहीं हैं, जितना कि वे तब होते, यदि अकेला भौतिकवादी दृष्टिकोण ही मौजूद होता। लेकिन उनका अंतिम उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि महात्मा गांधी तथा अन्य हिन्दुओं का इस प्रश्न पर क्या जवाब होता है कि मंदिर प्रवेश के इस प्रस्ताव के पीछे क्या अभियान है? क्या मंदिर प्रवेश हिन्दू समुदाय में दलित वर्गों के सामाजिक स्तर के उत्थान का अंतिम लक्ष्य है? या यह केवल पहला क़दम है और यदि यह पहला क़दम है, तो चरम लक्ष्य क्या है? अंतिम लक्ष्य मंदिर प्रवेश ही है, इस बात को दलित वर्ग कभी समर्थन नहीं दे सकता। वे वास्तव में न केवल इसे अस्वीकार कर दें, बल्कि तब वे स्वयं को हिन्दू समाज द्वारा अस्वीकार किया हुआ समझेंगे और अपना भाग्य कहीं और प्राप्त करने के लिये आज़ाद होंगे। दूसरी ओर, यदि यह उनके उत्थान के लिये उठाया जा रहा पहला क़दम मात्र है, तो वे इसे अवश्य समर्थन देना चाहेंगे। तब स्थिति उसके सदृश होगी, जो भारत की राजनीति में आज हो रहा है। सभी भारतीयों ने भारत के लिये डोमिनियन स्टेटस का दावा किया है। वास्तविक संविधान डोमिनियन स्टेटस को पूरा नहीं कर सकेगा और कई भारतीय इसको स्वीकार कर लेंगे। क्यों? उत्तर यह है कि चूंकि लक्ष्य परिभाषित है, इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि इसको एक ही छलांग में न प्राप्त करें, एक-एक क़दम बढ़ाकर प्राप्त किया जाये। लेकिन यदि अंग्रेजों ने डोमिनियन स्टेटस के लक्ष्य को स्वीकार न किया होता, तो उन आंशिक सुधारों को किसी ने भी स्वीकार न किया होता, जिन्हें स्वीकार करने के लिये अब अधिकांश तैयार हैं। इसी तरह, यदि महात्मा गांधी तथा अन्य सुधारक उस लक्ष्य की घोषणा करें जो उन्होंने हिन्दू समुदाय में दलित वर्गों के सामाजिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिये अपने सामने तय किया है, तो दलित वर्ग के लिये मंदिर प्रवेश के प्रति अपना नजरिया परिभाषित करना आसान होगा। दलित वर्गों का लक्ष्य भी यहाँ सभी संबद्ध लोगांं की जानकारी तथा विचार के लिये स्पष्ट किया जा सकता है। दलित वर्गों को एक धर्म चाहिये, जो उन्हें सामाजिक स्तर की समानता प्रदान कर सके। कोई गलतफहमी न हो, इसके लिये मैं धर्म-निरपेक्ष कारणों के चलते पैदा हुई सामाजिक बुराई तथा धर्म के सिद्धांत पर आधारित सामाजिक बुराइयों के बीच अंतर स्पष्ट करके अपना मत समझाना चाहूँगा। एक सभ्य समाज में सामाजिक बुराइयों का कोई औचित्य नहीं हो सकता। लेकिन सामाजिक बुराइयों को धार्मिक आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराने से अधिक घृणास्पद और नीच कृत्य और कुछ