खण्ड - IV कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह, नासिक और मन्दिर प्रवेश आन्दोलन - Page 209

192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं हो सकता। दलित वर्ग उन असमानताओं को नहीं मिटा सकते जिनका वे शिकार हो रहे हैं। लेकिन उन्होंने अपना मन बना लिया है कि वे ऐसे धर्म को बर्दाश्त नहीं करेंगे, जो इन असमानताओं को जारी रखने में समर्थन देगा।

यदि हिन्दू धर्म उनका धर्म है, तो इसे सामाजिक समानता का धर्म बनना पड़ेगा। हिन्दू धर्म संहिता में सभी के लिए मंदिर प्रवेश की अनुमति का प्रावधान डालकर मात्र संशोधन कर देने से हिन्दू धर्म सामाजिक स्तर की समानता वाला धर्म नहीं बन सकता। इससे बस यह होगा कि उन्हें भारतीय (राष्ट्रीय) के रूप में मान्यता मिल जायेगी और वे विदेशी (यदि मैं इस संबंध में वे शब्द इस्तेमाल कर सकता हूँ, जो राजनीति में इतने सुपरिचित हो चुके हैं) नहीं कहलायेंगे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इससे वे उस स्थिति पर पहुँच जायेंगे जहाँ वे आज़ाद और समान होंगे, किसी दूसरे से ऊपर या नीचे हुए बिना और इसका बिल्कुल सीधा-सा कारण है कि हिन्दू धर्म सामाजिक समानता के सिद्धांत को मान्यता नहीं देता। दूसरी ओर यह लोगों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के रूप में वर्गीकृत करके असमानता को प्रोत्साहित करता है, जो अब एक दूसरे के सामने नफ़रत का बढ़ता हुआ क्रम और अवमानना का घटता हुआ क्रम लिये हुए खड़े हैं। यदि हिन्दू धर्म को सामाजिक समानता का धर्म बनना हो, तो मंदिर-प्रवेश के लिये इसकी संहिता में संशोधन कर देना ही पर्याप्त नहीं है। इसे चतुर्वर्ण के सिद्धांत से मुक्त करने की आवश्यकता है। यही असमानता का मूल कारण है और जाति प्रणाली तथा अस्पृश्यता का जन्मदाता भी यही है, जो कि असमानता का रूप मात्र हैं। जब तक यह नहीं किया जाता, तब तक दलित वर्ग न केवल मंदिर प्रवेश को अस्वीकार करेगा बल्कि हिन्दू मत को भी अस्वीकार करेगा। चतुर्वर्ण और जाति प्रणाली दलित वर्गों के आत्म-सम्मान के साथ असंगत हैं। जब तक ये इसके प्रमुख सिद्धांत रहते हैं, दलित वर्गों की ओर हेय दृष्टि से देखा जाता रहेगा। दलित वर्ग केवल तभी अपने आपको हिन्दू कह सकते हैं, जब चतुर्वर्ण और जाति प्रणाली का सिद्धांत छोड़ दिया जाये और हिन्दू शास्त्रों में से इसे मिटा दिया जाये। क्या महात्मा और अन्य हिन्दू सुधारक इसे अपने लक्ष्य के रूप में स्वीकार करते हैं और क्या वे इसे प्राप्त करने की दिशा में काम करने का साहस रखते हैं? अपना अंतिम नज़रिया तय करने से पहले मुझे इस मुद्दे पर इनकी घोषणा का इंतज़ार है। लेकिन चाहे महात्मा गांधी और अन्य हिन्दू इसके लिये तैयार हों या न हों, हम यह बता दें कि इससे कम कुछ भी दलित वर्गों को संतुष्ट नहीं कर पायेगा और न ही उन्हें मंदिर प्रवेश स्वीकार करने के लिये सहमत कर पायेगा। मंदिर प्रवेश को स्वीकार कर लेने और इससे संतुष्ट हो जाने का अर्थ बुराई से समझौता कर लेना और अपने अंदर बसी मानव व्यक्तित्व की पवित्रता का सौदा कर लेना होगा।