खण्ड - IV कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह, नासिक और मन्दिर प्रवेश आन्दोलन - Page 210

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हालांकि, मेरे द्वारा रखी गई स्थिति पर महात्मा गांधी और अन्य हिन्दू सुधारक एक तर्क दे सकते हैं। वे कह सकते हैं : दलित वर्गों द्वारा इस समय मंदिर प्रवेश को स्वीकार कर लेने से, बाद में चतुर्वर्ण और जाति प्रणाली मिटाने के लिये आंदोलन करने का उनका अधिकार नहीं चला जायेगा। यदि उनका यह दृष्टिकोण है, तो मैं इस तर्क का जवाब इसी चरण में दे देना चाहूँगा, ताकि मामला निबट जाए और भावी विकासों के लिये रास्ता साफ़ हो सके। मेरा जवाब है कि यह सत्य है कि चतुर्वर्ण और जाति प्रणाली मिटाने के लिये संघर्ष करने का मेरा अधिकार खत्म नहीं होगा, यदि मैं अभी मंदिर प्रवेश को स्वीकार कर लूँ। लेकिन सवाल यह है कि जब यह प्रश्न रखा जायेगा, तब महात्मा गांधी किस तरफ होंगे? यदि वे मेरे विरोधियों के खेमे में होंगे, तो मैं उन्हें अभी बता दूँ कि मैं उनके खेमे में नहीं रह सकता और यदि वे मेरे पक्ष में रहने वाले हैं, तो उन्हें अभी मेरे पक्ष में हो जाना चाहिए।

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“डॉ. अम्बेडकर के सम्प्रदाय के दलित वर्ग के लगभग सभी नेताओं ने अपने नेता के विचारों का समर्थन किया। श्रीनिवासन, प्रेमताई और मलिक ने अपने नेता के विचारों का अनुमोदन किया।

इसके जवाब में गांधी ने एक वक्तव्य जारी किया, जिसमें उन्हांने कहा, “मैं एक हिन्दू हूँ, मात्र इसलिये नहीं कि मेरा जन्म हिन्दू समुदाय में हुआ, बल्कि मैं दृढ़ विश्वास और अपनी इच्छा से हिन्दू हूँ। मेरी धारणा वाले हिन्दुत्व में कोई बड़प्पन या घटियापन नहीं है। लेकिन यदि डॉ. अम्बेडकर वर्णाश्रम से ही संघर्ष करना चाहते हैं, तो मैं उनके खेमे में नहीं रह सकता, क्योंकि मैं वर्णाश्रम को हिन्दू धर्म का एक अभिन्न हिस्सा मानता हूँ।’’ ख्1, [*]

उपरोक्त सत्याग्रह के संबंध में डॉ. अम्बेडकर ने भाऊराव गायकवाड़ को लिखे निम्न-पत्र में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया :

भीमराव आर. अम्बेडकर राजगृह कॉलोनी,

एम.ए., पी.,एच.डी., डी.एस.सी. दादर, बम्बई-14,

बैरिस्टर-एट-लॉ, जे.पी., 3-3-34

एम.एल.सी.

  1. कीर, पृष्ठ 230।

* मंदिर-प्रवेश अभियान पर टिप्पणी के लिए परिशिष्ट- VI देखें।