194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रिय भाऊराव,
आपका 23 फरवरी का पत्र मिला। आपकी कृपा है कि आपने मुझसे आगामी राम नवमी पर नासिक के कलाराम मंदिर में दलित वर्गों द्वारा सत्याग्रह शुरू करने की उपयुक्तता पर मेरे विचार पूछे हैं। मैं यह कहूँगा कि इस तरह का क़दम अनावश्यक होगा और इसे न केवल स्थगित करना चाहिए, बल्कि पूरी तरह से बंद कर देना चाहिये। सत्याग्रह का सृजन करने वाले व्यक्ति के मुँह से ऐसी बात आपको अजीब और आश्चर्यजनक लग सकती है। लेकिन मैं इस मोर्चे पर बदलाव की घोषणा करता हूँ। मैंने मंदिर-प्रवेश आंदोलन इसलिये शुरू नहीं किया था कि मैं चाहता था कि दलित वर्ग मूर्तियों की उपासना करें, जिनकी उपासना से उन्हें रोका जा रहा था क्योंकि मैं सोचता था कि मंदिर-प्रवेश से वे हिन्दू समाज के समान सदस्य और अभिन्न हिस्सा बन जायेंगे। जहाँ तक मामले के इस पहलू का संबंध है, मैं दलित वर्गों को सलाह दूँगा कि हिन्दू समाज का अभिन्न अंग बनना स्वीकार करने से पहले वे हिन्दू समाज तथा हिन्दू धर्मशास्त्र को पूरी तरह से बदलने पर दृढ़ रहें। मैंने मंदिर-प्रवेश सत्याग्रह केवल इसलिये शुरू किया था, क्योंकि मुझे लगता था कि दलित वर्गों में ऊर्जा का संचार करने और उन्हें अपनी स्थिति के प्रति जागरूक करने का यही सर्वोत्तम तरीका था। जैसा कि मुझे विश्वास है कि वह उद्देश्य प्राप्त कर लिया गया है, अतः अब मुझे मंदिर प्रवेश आंदोलन की कोई आवश्यकता नज़र नहीं आती। मैं चाहता हूँ कि दलित वर्ग अपनी ऊर्जा और संसाधन राजनीति और शिक्षा पर लगायें और मुझे उम्मीद है कि वे दोनों का महत्त्व समझ जायँगे।
आपका,
ह./-बी.आर. अम्बेडकर” ख्1,
तदनुसार सत्याग्रह तुरंत रोक दिया गया-संपादक
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नासिक, 19 नवम्बर, 1934
विंचूर के स्वर्गीय श्री धोंधिबा रून्खाम्बे के देहांत के 11वें दिन के समारोह में विंचूर में एकत्र हुई दलित वर्गां की 15,000 सदस्यों से भी अधिक की विशाल भीड़ के
- खैरमोर, खंड-3, पृष्ठ 357-358।