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समक्ष डॉ. अम्बेडकर ने एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घोषणा की। उन्होंने कहा कि उनसे बार-बार पूछा जा रहा है कि कलाराम मंदिर आंदोलन गत दो वर्षों से स्थगित क्यों कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि इसकी एकमात्र कारण यह है कि इस तरह के आंदोलन की अब कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि मंदिर-प्रवेश सत्याग्रह के सृजनकर्ता के मुँह से आपको यह बात अजीब और आश्चर्यजनक लग सकती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर-प्रवेश आंदोलन इसलिये शुरू किया गया था क्योंकि उन्हें लगा था कि दलित वर्गों में ऊर्जा का संचार करने और उन्हें उनकी स्थिति के प्रति जागरूक करने का यही सबसे अच्छा तरीका है। उनका मानना था कि वह उद्देश्य हासिल कर लिया गया है और इसलिये मंदिर-प्रवेश की अब कोई आवश्यकता नहीं।
उन्होंने दलित वर्गों को मंदिर प्रवेश की बजाय अपनी ऊर्जा तथा संसाधन राजनीति में लगाने की सशक्त राय दी। चूँकि, आने वाले सुधारों में उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य और इस प्रकार अपने मानक तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी है।
अंत में, उन्होंने नासिक मंदिर-प्रवेश सत्याग्रहियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि इन्होंने न केवल अपने भाइयों को जगाया है और उन्हें हिन्दू समाज में उनकी असली जगह का एहसास कराया है, बल्कि पूरे सभ्य संसार में दलित वर्गों के प्रति गहरी सहानुभूति भी पैदा की है। उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षित करने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया।” ख्1,
डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में “कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिये क्या किया है” विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं, जिसमें उन्होंने कहा है :
“अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने अभियान को आगे बढ़ाने के लिये यहाँ श्री गांधी के पास एक अवसर था। वे यह प्रस्ताव रख सकते थे कि यदि कोई हिन्दू काँग्रेस के सदस्य के रूप में भर्ती होना चाहता है, तो उसे साबित करना होगा कि वह अस्पृश्यता में विश्वास नहीं रखता और अपने इस दावे को सही साबित करने हेतु उसे अपने घर में एक अस्पृश्य को रोज़गार देना होगा और इसके अलावा कोई भी साक्ष्य उसके इस दावे का सबूत नहीं माना जायेगा। ऐसा प्रस्ताव अव्यावहारिक नहीं होता, क्योंकि लगभग हर हिन्दू, विशेषतः स्वयं को सवर्ण हिन्दू कहने वाले अपने घर में एक से अधिक नौकर रखते हैं। यदि श्री गांधी हिन्दू के लिए चरखा कातने और
- द टाइम्स ऑÚ इंडिया, 21 नवम्बर, 1934।