196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बहिष्कार को काँग्रेस की सदस्यता पाने के लिये योग्यता रख सकते हैं, तो वे हिन्दू परिवार द्वारा अपने घर में एक अस्पृश्य को रोजगार देने को भी काँग्रेस का सदस्य बनने की योग्यता तय कर सकते थे। लेकिन श्री गांधी ने ऐसा नहीं किया।
वर्ष 1924 के बाद से वर्ष 1930 तक कुछ भी नहीं किया गया है। इस अवधि के दौरान श्री गांधी ने अस्पृश्यता हटाने के लिये कोई सक्रिय कदम नहीं उठाये हैं और न ही अस्पृश्यों के लिये लाभदायक किसी गतिविधि में दिलचस्पी दिखाई है। जब श्री गांधी निष्क्रिय थे, तब अस्पृश्यों ने स्वयं ही ‘सत्याग्रह’ नाम का एक आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन का उद्देश्य मंदिरों में प्रवेश करने तथा सार्वजनिक कुँओं से पानी लेने के अस्पृश्यों के अधिकार को स्थापित करना था। बम्बई प्रेसिडेंसी के कोलाबा जिले के एक कस्बे महाड में स्थित चौदर टैंक में सत्याग्रह सार्वजनिक जल स्रोतों से अस्पृश्यों के पानी लेने के अधिकार को स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था। बम्बई प्रेसिडेंस के नासिक जिले के नासिक कस्बे में स्थित कलाराम मंदिर में सत्याग्रह अस्पृश्यों के हिन्दू मंदिरों में प्रवेश करने के अधिकार को स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था। कई छोटे-छोटे सत्याग्रह भी किये गये। हालांकि, दो प्रमुख यही थे, जिन पर अस्पृश्यों और उनके विरोधी, सवर्ण हिन्दुओं के प्रयास केंद्रित थे। इनके द्वारा मचाया गया शोर-गुल पूरे भारत में सुना गया। अस्पृश्य वर्ग के हजारों स्त्री-पुरुषों ने इन सत्याग्रहों में हिस्सा लिया। अस्पृश्य स्त्री-पुरुषों को हिन्दुओं द्वारा बेइज्जत किया गया व मारा-पीटा गया। कई घायल हुए और कई को सरकार द्वारा शांति भंग करने के जुर्म में जेल में डाल दिया गया। यह सत्याग्रह आंदोलन पूरे छः वर्ष चला और 1935 में नासिक जिले के येऑला शहर में हुए एक सम्मेलन में इसे बंद करने की घोषणा की गई। इस सम्मेलन में अस्पृश्यों को समान सामाजिक अधिकार देने से इनकार करते हुए हिन्दुओं द्वारा अपनाये गये हठी रवैये को देखते हुए अस्पृश्यों ने हिन्दू समुदाय से बाहर चले जाने का संकल्प लिया। इस सत्याग्रह आंदोलन में निस्संदेह कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी। यह अस्पृश्यों द्वारा आयोजित किया गया था, अस्पृश्यों द्वारा इसका नेतृत्व किया गया था और इसे वित्तीय समर्थन भी अस्पृश्यों द्वारा ही दिया गया था। फिर भी अस्पृश्यों को श्री गांधी से नैतिक समर्थन मिलने की उम्मीद थी। क्योंकि सत्याग्रह का हथियार- जिसका प्रमख गुण यातना सह कर विरोधी का दिल पिघलाना है- वह हथियार था, जिसकी शुरुआत श्री गांधी द्वारा ही गई थी और उन्होंने कॉंग्रेस का नेतृत्व करते हुए स्वराज प्राप्त करने हेतु इसे अंग्रेजों के विरुद्ध इस्तेमाल किया था। स्वाभाविक था कि अस्पृश्य सवर्ण हिन्दुओं के विरुद्ध अपने सत्याग्रह में महात्मा गांधी के पूरे समर्थन की उम्मीद कर रहे थे। इस सत्याग्रह का उद्देश्य अस्पृश्यों के सार्वजनिक कुँओं