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से पानी लेने और सार्वजनिक हिन्दू मंदिरों में प्रवेश करने के अधिकार को स्थापित करना था। परंतु श्री गांधी ने सत्याग्रह को अपना समर्थन नहीं दिया और समर्थन न देने के अलावा उन्होंने कड़े शब्दों में इसकी निंदा भी की।
इस संदर्भ में मानवीय गलतियों को सुधारने हेतु अपनाये जाने वाले दो अनोखे हथियारों का उल्लेख किया जा सकता है। उन्हें गढ़ने और निष्पादित करने का पूरा श्रेय विशिष्ट रूप से श्री गांधी को जाता है। पहला है, सत्याग्रह। श्री गांधी ने सत्याग्रह के इस हथियार का प्रयोग राजनीतिक त्रुटियों को दूर करने हेतु ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कई बार किया है। लेकिन श्री गांधी ने सत्याग्रह के इस हथियार का प्रयोग हिन्दुओं से अस्पृश्यों के लिये मंदिर एवं कुँएं खुलवाने के लिये हिन्दुओं के विरुद्ध कभी नहीं किया। उपवास श्री गांधी का दूसरा हथियार है। कहा जाता है कि श्री गांधी ने कुल मिलाकर 21 उपवास किये हैं। इनमें से कुछ हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिये थे और अनेक उनके आश्रम के सदस्यों द्वारा किये गये अनैतिक कृत्यों के प्रायश्चित स्वरूप। एक उपवास बम्बई सरकार द्वारा पटवर्धन नाम के कै़दी को अपमार्जक का काम दिये जाने से इनकार करने के आदेश के विरुद्ध किया गया था, यद्यपि उसने स्वयं ही इस कार्य की मांग की थी। इन 21 उपवासों में से अस्पृश्यता मिटाने के लिये एक भी नहीं था। ये तथ्य काफ़ी उल्लेखनीय हैं।
सन् 1930 में गोल मेज़ सम्मेलन हुआ। श्री गांधी 1931 में सम्मेलन की चर्चाआें में शामिल हुए। सम्मेलन। भारत के स्वशासन के लिए संविधान तैयार करने के महत्त्वपूर्ण प्रश्न से संबंधित था। इस बात पर सर्वसम्मति बनी कि यदि भारत को स्वशासित देश बनना है तो सरकार जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए होनी चाहिए। हर कोई सहमत था कि जब कोई सरकार वास्तविक रूप में जनता द्वारा सरकार होगी तभी वह जनता की और जनता के लिए सरकार बन सकेगी। समस्या यह थी कि समुदायों, बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों (जो न सिर्फ सामाजिक फूट बल्कि सामाजिक प्रतिद्वन्द्विता से भी आवेशित हैं) में बँटे देश में जनता की सरकार कैसे बनाई जाए। इन परिस्थितियों को देखते हुए यह सहमति बनी कि भारत में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के आधार पर विधायिका और कार्यपालिका बनाए बिना जनता की सरकार की कोई संभावना नहीं है।
सम्मेलन में अस्पृश्यों की समस्या छाई रही। इसने एक नया पहलू ग्रहण किया। प्रश्न यह थाः क्या अछूतों को इसी तरह हिन्दुओं के रहमो-करम पर छोड़ दिया जाए अथवा साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का उन तक विस्तार करके उन्हें अपनी रक्षा करने के माध्यम प्रदान किए जाएँ? हिन्दुओं की दया पर छोडे़ जाने का अछूतों ने सख्ती से विरोध किया तथा अन्य अल्पसंख्यकों को दी गई सुरक्षा जैसी ही सुरक्षा