208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भावी कार्य की भावना को बिल्कुल दबा दिया है- यही उनके प्रति हमारी निष्ठा है। और यह स्वाभाविक ही है कि हमें आज अपने सामने खड़ी समस्याओं से निपटने की बजाय उनके लिये उपयुक्त स्मारक खड़े करने के विषय में अधिक चिन्तित होना चाहिए, जिन्होंने हमारे लिये निरंतर परिश्रम किया है।
भारतीय समाचार-पत्रों से अभी तक यह पता चलता है कि श्री गोखले की स्मृति में सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की शाखायें विभिन्न स्थानों पर स्थापित की जायेंगी, जबकि श्री पी.एम. मेहता के स्मारक के रूप में बम्बई म्यूनिसिपल ऑफिस के सामने उनकी प्रतिमा खड़ी की जायेगी।
यदि मुझे व्यक्तिगत रूप से अपनी राय देने की अनुमति हो तो मैं कहूँगा कि श्री मेहता के लिये स्मारक का यह रूप बहुत ही तुच्छ और अनुपयुक्त है।
मुझे यह समझने में बेहद पीड़ा होती है, कि उनका स्मारक ऐसे रूप में क्यों नहीं हो सकता, जो कि न केवल उनका सच्चा स्मारक हो, बल्कि भावी पीढि़यों के लिए स्थायी रूप से काम आता रहे।
इन दोनों उद्देश्यों को संयोजित करके, अपनी विनम्र राय से मैं यह सुझाव दूँगा कि श्री पी.एम. मेहता का स्मारक बम्बई में एक सार्वजनिक पुस्तकालय के रूप में हो, जिसे “फ़ीरोजशाह मेहता लाइब्रेरी” के नाम से जाना जाये।
यह दुर्भाग्य की बात है कि समाज की संवृद्धि एवं विकास में एक संस्थान के रूप में पुस्तकालय का महत्त्व हमने अभी तक नहीं समझा है। लेकिन यह वक्त इसके महत्त्व का प्रचार करने का नहीं है। बम्बई की जनता जैसी जागरूक जनता इतने समय तक बिना किसी आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालय के रह रही है, यह अपने-आप में काफी शर्म की बात है और इस गलती को जितनी जल्दी सुधार लिया जाये उतना अच्छा है।
बम्बई में कुछ निजी पुस्तकालय अपने-आप स्वतंत्र रूप से संचालित हो रहे हैं। यदि इन सभी कु-प्रबंधित पुस्तकालयों को एक ही इमारत में ले आया जाये, जो कि सर पी.एम. मेहता स्मारक निधि से बनाई गई हो और इसे सर फीरोजशाह मेहता लाइब्रेरी का नाम दे दिया जाये, तो बम्बई शहर के दोनों उद्देश्य पूरे हो जायेंगे। जहाँ तक पुस्तकों की खरीद तथा आधुनिक ढंग से पुस्तकालय के प्रबंध के लिये धन-राशि का सवाल है, मुझे पूरा विश्वास है कि इस उद्देश्य के लिये कई उदार-हृदय लोग आगे आ जायेंगे।
अमरीका के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक का छात्र होने के नाते मैं इस