खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 23

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पुरोहित-विरोधी थी। डॉ. अम्बेडकर, जो कि अछूत हिन्दुओं की जागृत आत्मा का प्रतिनिधित्व करते थे, उस टैंक की ओर जा रहे थे जिससे तथाकथित स्पृश्य हिन्दूओं के साथ-साथ मुसलमान और ईसाई पानी लेते थे, परंतु जिससे अछूत हिन्दुओं को, जो कि हिन्दू देवताओं की पूजा करते थे, जो युगों से उसी हिन्दू धर्म को मानते रहे, उनके गले प्यास से सूखे रहने पर भी एक बूंद पानी नहीं लेने दिया जाता था।

इस प्रकार, अस्पृश्य अपने इतिहास में पहली बार अपने ही एक बड़े नेता के नेतृत्व में अपने अधिकारों का समर्थन करने हेतु मार्च कर रहे थे। उन सबने अनुशासन, ऊर्जा और उत्साह दिखाया। यह मार्च धीरे-धीरे महाद की गलियों में से गया और चौदार टैंक पर समाप्त हो गया। डॉ. अम्बेड़कर अब स्वयं टैंक के किनारे पर खड़े थे। शिक्षितों में शिक्षित, पृथ्वी पर किसी भी विद्वान आदमी के समकक्ष, उच्च आकांक्षाओं वाला हिन्दू फिर भी सार्वजनिक जल सरणी से पानी लेने में भी असमर्थ था अथवा अपनी जन्म-भूमि और धर्म भूमि हिन्दुस्तान में किसी भी सार्वजनिक पुस्तकालय में पढ़ने में असमर्थ था, वह अब अत्याचारियों के अहंकार को चुनौती दे रहा था, उन लोगों की नीचता की पोल खोल रहा था जो यह शेखी बधारते थे कि उनका धर्म जानवरों से भी सहिष्णुतापूर्वक व्यवहार करता है, परंतु जो अपने ही सहधर्मियों से बिल्लियों और कुत्तों से भी बुरा व्यवहार करते हैं।

डॉ. अम्बेड़कर ने टैंक से पानी लिया और उसे पी लिया। लोगों की बहुत बड़ी भीड़ ने उनका अनुसरण किया और अपने अधिकार का समर्थन किया। तत्पश्चात् जुलूसवाले शांतिपूर्वक पंडाल में लौट गए।

इस घटना के दो घंटे बाद कुछ कुबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं ने झूठी अफवाह फैला दी कि अछूत भी वीरेश्वर हैं मंदिर में प्रवेश करने की योजना बना रहे है। इस पर निम्न वर्गों की एक बड़ी भीड़ बांस के डंडे लिए गलियों के नुक्कड़ों पर एकत्र हो गई। सारा रूढि़वादी महाड सशस्त्र खड़ा हो गया और सारा कस्बा एकदम उभड़ता हुआ जन -समूह बन गया। उन्होंने कहा कि उनका धर्म खतरे में है, और बड़ी विलक्षण बात है कि उन्होंने शोर मचाया कि उनके भगवान को भी अपवित्र किए जाने का खतरा है। इस अपमाजनक चुनौती से उनके दिल घबराए हुए थे, उनके हाथ कांप रहे थे और उनके चेहरे क्रोध से तमतमाये हुए थे।

अपने धर्म को गलत समझे जाने से हुए घोर अपमान और वीरेश्वर को मंदिर अपवित्र किए जाने के विचार से क्रुद्ध सवर्ण हिन्दू तेजी से दलित वर्ग सम्मेलन के पंडाल में चले गए। उस समय बहुत से प्रतिनिधि छोटे-छोटे समूहों में शहर में फैले हुए थे। कुछ पैकिंग कर रहे थे और कुछ अपने गांवों में जाने से पूर्व खाना खा रहे थे।