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अब तक अधिकांश प्रतिनिधि कस्बे को छोड़ चुके थे। उपद्रवी पंडाल में प्रतिनिधियों पर झपट पड़े, उनके खाने को मिट्टी में गिरा दिया, उनके बर्तनों को तड़ातड़ तोड़ने लगे और उन्होंने कुछ प्रतिनिधियों को, उनके यह जाने बिना ही कि क्या हो गया, बुरी तरह पीटा। पंडाल में पूरी अस्तव्यस्तता थी। अब तक रूढि़वादी अपना विवेक
खो चुके थे। अब वे अपने होश खोने के लक्षण दिखाने लगे थे।
अछूत बच्चे, महिलाएं और प्रतिनिधि, जो महाद की गलियों में टहल रहे थे इस घटना में अचानक मोड़ आ जाने से भयभीत थे। उनमें से रास्ता भटक गए व्यक्तियों को पीटा गया। उन्हें शरण के लिए दौड़कर मुसलमानों के घरों में जाना पड़ा। स्थानीय मामलातदार और पुलिस निरीक्षक, जो उपद्रवियों को रोकने में असफल रहे, इस मामले में, शाम के चार बजे यात्री बंगले में गए जहां कि सम्मेलन के दिनों में डॉ. अम्बेडकर और उनका दल ठहरा हुआ था। डॉ. अम्बेड़कर ने अधिकारियों से कहा : ””आप अन्य लोगों को नियंत्रित कीजिए, मैं अपने लोगों को नियंत्रित करूंगा,” और वह अपने दो या तीन लेफ्टिनेंटों सहित शीघ्रता से घटनास्थल पर गए। गली में उपद्रवियों के एक दल ने उन्हें घेर लिया, परंतु उन्होंने शांतिपूर्वक उन्हें शांत करने की कोशिश की और कहा कि उनकी ओर से मंदिर में प्रवेश करने की न तो कोई इच्छा है और न कोई योजना। वे आगे गए, स्थिति को स्वयं देखा और बंगले में वापस चले गए। इस समय तक अछूतों में से लगभग बीस व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गए थे। एक डाक्टर को बुलाया गया और वे आए। उन्होंने उनके असामयिक साहसिक कार्य के लिए उनका उपहास किया और उनके घावों पर मरहमपट्टी की।
तत्पश्चात्, उपद्रवियों ने मुख्य गलियों की गस्त लगानी शुरू कर दी और दलित वर्गों के उन सदस्यों पर हमला करना शुरू कर दिया, जो छुटपुट टोलियों में अपने गांवों को जा रहे थे। परंतु उनके व्यवहार का सर्वाधिक निन्दनीय भाग यह था कि उन्होंने अपने अनुचरों को संदेश भेजे कि वे अपने-अपने गांवों में सम्मेलन के प्रतिनिधियों को दंडित करें। इस आदेश के पालन में अनेक महार स्त्री-पुरूर्षों पर, उनके अपने गांवों में पहुंचने से पहले या बाद में, हमले किए गए।
इसी बीच, प्रतिनिधियों पर इस क्रूर हमले की खबर आग की तरह फैल गई। जब डॉ. अम्बेडकर बंगले पर लौटे, तो उन्होंने लगभग एक सौ आदमियों को उनके आदेशों का अधीरता से इंतजार करते देखा, उनकी आंखें अक्षरशः आग से दहक रही थीं और उनके हाथ प्रतिशोध और बदला लेने के लिए बेचैन थे। तथापि उनके नेता ने शांति और अनुशासन का अनुरोध किया। कुछ देर तक निस्तब्ध चुप्पी पसरी रही अन्यथा डॉ. अम्बेडकर के एक ही भड़काऊ शब्द से महाद में खून-खराबा और बरवादी हो जाती। कस्बे, पंडाल और बंगले में अभी भी ठहरे हुए प्रतिनिधियों की कुल