6. अग्रेषण पत्र। - Page 230

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कर रही है, जो यह सोचती है कि छात्रावास को अनुदान बंद किये जाने का असली कारण है। वक्तव्य में कहा गया है कि अध्यक्ष महोदय ने “अंशदान बही में गंभीर अनियमिततायें देखीं और खातों की बहियाँ मंगवाईं और सोसायटी द्वारा इनकार किये जाने पर अनुदान रोक दिया गया।” मुझे अफसोस है कि मुझे कड़ी भाषा का प्रयोग करना पड़ रहा है, लेकिन मैं कहूँगा कि ये सभी वक्तव्य असत्य पर आधारित हैं।

वास्तविक तथ्य ये हैंः- 1925 में शोलापुर में छात्रावास खोला गया। छात्रावास की गई शुरुआत से ही नगरपालिका ने इसके लिये अनुदान दिया। दो वर्षों, 1925 तथा 1926 तक अनुदान बिना किसी रुकावट के नियमित रूप से अदा किया जाता रहा। कोई निरीक्षण नहीं हुआ न ही संस्था के खातों का कोई परीक्षण किया गया। नगरपालिका संस्था के खातों से लेखा परीक्षित संतुष्ट थी। लेकिन 1927 के चुनावों के बाद अस्तित्व में आई नगर-पालिका और खास तौर से इसके अध्यक्ष डॉ. वी.वी. मुले के रवैये में पूरी तरह से बदलाव आ गया। ऐसा हुआ कि स्कूल बोर्ड के चयेरमैन ने वर्ष 1927 की शुरुआत में संस्था का आकस्मिक दौरा किया, जिसके दौरान उन्होंने छात्रावास का निरीक्षण किया और खातों का परीक्षण किया। हमेशा की ही तरह उन्होंने आगुंतक पंजी में अपनी टिप्पणी लिखी और कहा कि खाते यथासंभव उत्तम तरीके से रखे गये हैं। इस टिप्पणी की प्रति अधीक्षक द्वारा अध्यक्ष को भेज दी गई।

लेकिन ये सज्जन, बजाय प्रसन्न होने के, अपने आचार-व्यवहार से यह दिखाने लगे जैसे स्कूल बोर्ड के चेयरमैन की अनुकूल टिप्पणी ने इनकी योजना विफल कर दी हो। क्योंकि, इसके तुरंत बाद ही उन्होंने 19 मार्च, 1927 के अपने पत्र द्वारा अधीक्षक से वर्ष 1925 तथा 1926 के खाते प्रस्तुत करने की माँग की। इस पर अधीक्षक द्वारा जवाब भेजा गया कि पुराने बही खाते बम्बई स्थित मुख्यालय को भेज दिये गये थे और वर्ष की समाप्ति के बाद नष्ट कर दिये गये थे और वर्तमान वर्ष के बही खाते उपलब्ध हैं और परीक्षण के लिये पेश किए गये थे।

इस बीच, खातों के परीक्षण के लिये नगर-पालिका ने एक उप-समिति नियुक्त की, जिसमें स्कूल बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री बुवालाल वकील और बोर्ड के सदस्य श्री शिवलाल अप्पा देशमुख शामिल थे। अध्यक्ष के अपने आदमियों से गठित इस समिति ने, जिसको संस्था के विषय में कोई जानकारी नहीं थी, खातों के परीक्षण के बाद 2 मई, 1927 को दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा कि खाते यथा संभव श्रेष्ठ तरीक से रखे गये हैं और वे छात्रावास के खिलाफ़ कुछ नहीं कह सकते। यह रिपोर्ट नगरपालिका को सौंप दी गई।

अपने ही आदमियों द्वारा उस संस्था के बारे में जिसे वह बेहद नापसंद करते हैं, इतनी अनुकूल रिपोर्ट मिलने से अध्यक्ष महोदय का नज़रिया बदलने की बजाय वे और भड़क गये और फिर पिछले वर्षों, 1925 तथा 1926, के बही खाते पेश करने के लिये ज़ोर देते रहे। मुख्यालय से उन्हें वही एक जवाब मिला, जो कि दिया जा