6. अग्रेषण पत्र। - Page 231

214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सकता था-सोसायटी के पुराने बही खातों का परीक्षण लेखा-परीक्षकों द्वारा कर लिया गया था, जिनके प्रमाणित खाते जमा कर दिये गये हैं और वर्तमान खाते निरीक्षण के लिये खुले हैं, इनका निरीक्षण नगरपालिका किसी भी समय कर सकती है। इसके बाद नगरपालिका के प्रशासनिक अधिकारी ने खातों का परीक्षण किया और प्रमाणि् ात किया कि उनमें कुछ भी गड़बड़ नहीं है। इससे लगता है, अध्यक्ष महोदय को शर्मिन्दगी उठानी पड़ी। क्योंकि, इसके बाद इन्होंने पुराने बही खाते प्रस्तुत किये जाने की अपनी माँग छोड़ दी और अधीक्षक को सूचित किया कि उनके सामने यदि वर्तमान वर्ष के बही खाते प्रस्तुत कर दिये जायें तो वे संतुष्ट हो जायेंगे। ऐसा कर दिया गया और मुझे कहते हुए खुशी हो रही है कि अध्यक्ष महोदय को संस्था के खिलाफ़ कुछ नहीं मिला। संस्था को खराब प्रबंध के आधार पर अयोग्य घोषित करने के हर प्रयास से निराश अध्यक्ष महोदय ने नगरपालिका की गत बजट बैठक के दौरान संस्थान को अनुदान देना बंद करने का प्रस्ताव रखा। लेकिन उस समय संस्थान पर लगाये गये सभी आरोप मिथ्या व विद्वेषपूर्ण थे और नगर पार्षदों द्वारा उनकी अवज्ञा की गई, जो होनी ही चाहिये थी........। एक को छोड़ बाकी सभी पार्षद अध्यक्ष की राय न मान अनुदान देने के लिये एकमत थे। इस तरह देखा जा सकता है कि अनुदान बंद किये जाने की बात तो दूर, नगरपालिका ने अपने ही अध्यक्ष द्वारा लगाये गये आरोपों को विश्वास के काबिल न मानकर अपने बजट में अनुदान स्वीकार किया। वास्तव में हुआ यह, कि अनुदान स्वीकार हो जाने के बाद अध्यक्ष महोदय ने इस आधार पर इसे देने से इनकार कर दिया कि खाते दिखाने के संबंध में सोसायटी का जवाब संतोषजनक नहीं था।

अब यह मेरी समझ से बाहर है कि सोसायटी का जवाब असंतोषजनक कैसे माना जा सकता है। सोसायटी वर्तमान वर्ष के खाते दिखाने के लिये हर समय तैयार थी। गत वर्षों के खाते प्रस्तुत करने के संबंध में जो जवाब सोसायटी द्वारा दिया गया, वही एकमात्र जवाब इस माँग का हो सकता है। गत वर्षों के बहीखाते आखि़र कौन दिखा सकता है? यहाँ माँग न केवल अनौचित्यपूर्ण है, बल्कि भ्रष्ट भी है जो कि किसी भी सोसायटी द्वारा पूरी नहीं की जा सकती। इन सब बातों से कोई भी न्यायपूर्ण व्यक्ति यह देख सकता है कि कैसे नगरपालिका और उसका अध्यक्ष एक झूठ को नहीं, बल्कि बनाये हुये झूठ को उजागर करने का प्रयास करते-करते अन्ततः झूठ से उत्पन्न झूठों का ही प्रचार करते चले जा रहे हैं........

बी.आर. अम्बेडकर“ ख्1,

दामोदर हॉल

परेल, 8 दिसम्बर, 1928

  1. द इंडियन नेशनल हेराल्ड, 10 दिसम्बर, 1928।