7. मन्दिर प्रवेश की बजाय आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक सुधार पर अधिक ध्यान दें। - Page 234

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साक्षात्कार के दौरान श्रीमती सरोजिनी नायडू उपस्थित थीं और श्री गांधी तथा जो लोग साक्षात्कार के बाद डॉ. अम्बेडकर से मिले, उन्हें ऐसे संकेत प्राप्त हुए कि श्री गांधी ने अस्पृश्यता-विरोधी लीग समितियों के गठन के डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव को पसंद किया है।

यरवदा से मिली ताज़ा खबर के अनुसार श्री गांधी “पूरी तरह से स्वस्थ” हैं और डॉ. अम्बेडकर ने अपने मित्रों से कहा कि कांग्रेसी नेता पूर्णतः जीवन्त हैं और पूरी तरह से सामान्य स्वास्थ्य लाभ कर चुके हैं।

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एक साक्षात्कार में डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि “अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन में निश्चित रूप से कुछ शिथिलता आई है।’’ लेकिन, चूँकि यह आंदोलन केवल अस्पृश्यों के मंदिर-प्रवेश तथा सवर्ण लोगों के साथ खाने-पीने पर रोक हटाने से संबंधित था, इसलिए मैं इस तथ्य से बहुत व्याकुल हुआ हूँ कि इन्होंने लोगों के बीच काफी वैर-भाव पैदा कर दिया है और उन्हें कोई ठोस लाभ नहीं पहुँचाया है।

“अस्पृश्यता-विरोधी लीग तथा इस उद्देश्य के लिये काम कर रहे लोगों का ध्यान मंदिर-प्रवेश और साथ खाने-पीने की बजाय अस्पृश्यों के आर्थिक, शैक्षिक तथा सामाजिक विकास पर होना चाहिये। कुंएँ खोलने और अस्पृश्यों के बच्चों को पब्लिक स्कूलों में भर्ती करने के लिये इनके द्वारा सार्वजनिक दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिये।”

बेलगांव जिले का हवाला देते हुये, जहाँ दलित वर्ग के लोगों द्वारा स्वयं अपने लिये एक अलग कुंएँ के निर्माण के लिये अनुरोध किया गया है, उन्होंने कहा कि बोर्ड को ऐसा अनुरोध मंज़ूर नहीं करना चाहिये। अस्पृश्यों को सामान्य सार्वजनिक कुँओं से पानी लेने के अपने अधिकार पर डटे रहना चाहिए। उन्होंने संदेह प्रकट किया कि इस मामले में दलित वर्गों को ज़रूर किसी स्वार्थी दल ने अपने प्रभाव में लिया है।“ ख्1,

  1. द टाइम्स ऑफ इंडिया, 19 अक्तूबर, 1932।