220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि सवर्ण हिन्दू उम्मीदवार के विरुद्ध खुली चुनावी लड़ाई में दलित वर्ग द्वारा किसी भी स्थान पर विजय प्राप्त कर लेना ज़रा भी संभव होता, तो ’पूना संधि’ की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। इसलिये, यह स्पष्ट है कि, इन प्रांतों के सैकेण्ड चैम्बर में दलित वर्गों का कोई प्रतिनिधि नहीं होगा। बंगाल तथा बिहार में, यह प्रावधान किया गया है कि सैकेण्ड चैम्बर में क्रमशः 65 में से 27 तथा 30 में से 12, प्रांतीय लोअर हाउस के सदस्यों द्वारा इकहरे हस्तांतरणीय मत की विधि द्वारा चुने जायेंगे।
अपर्याप्त सीटें
इससे दलित वर्गों के लिये इन दो प्रांतों में सैकेण्ड चैम्बर में प्रतिनिधित्व हासिल करने की संभावनायें खुल जाती हैं। परन्तु इन तथ्यों का नज़दीकी से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होगा कि, बिहार में कोई संभावना नहीं हेी, क्योंकि प्रांतीय लोअर हाउस में पिछड़े वर्ग की सीटें (152 में से 15) उन्हें आवश्यक कोटा दिला पाने के लिये पर्याप्त नहीं होंगी और बंगाल में 250 के सदन में 30 सीटों से उन्हें मुश्किल से एक सीट का ही कोटा मिल पायेगा।
किसी भी प्रांतीय सैकेण्ड चैम्बर में न केवल दलित वर्गों के लिये कोई सीट नहीं होगी, बल्कि मताधिकार के चलते वे सैकेण्ड चैम्बर्स के चुनावों को प्रभावित भी नहीं कर पायेंगे।
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आरक्षित सीटों की आवश्यकता
लगता है, कि संयुक्त संसदीय समिति ने इसके प्रस्ताव के प्रतिकूल प्रभावों पर कोई विचार नहीं किया है, जो सैकेण्ड चैम्बर्स में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व पर डालेंगे। अपने मताधिकार प्रस्ताव के संबंध में समिति का मानना है कि, ’’उपरोक्त अर्हता उम्मीदवारों पर भी लागू होगी, किन्तु महिलाओं तथा दलित वर्गों के मामले में विशेष प्रावधान की आवश्यकता हो सकती है।’’ उस विशेष प्रावधान की आवश्यकता होगी, इसमें कोई संदेह नहीं। किन्तु, जो मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ, वह यह है कि दलित वर्गों के पक्ष में अर्हता के अन्तर से कोई लाभ नहीं होगा, यदि मतदाताओं के मताधिकार समान रहते हैं। वास्तव में, दलित वर्गों के मतदाताओं के पक्ष में अर्हता के अन्तर से उन्हें चुनाव जीतने में कोई मदद नहीं मिलेगी, जब तक कि उनके लिये सीटें आरक्षित न हों।