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फेडरल अपर हाउस में प्रतिनिधित्व के मामले में भी दलित वर्गों की स्थिति पूर्णतया बदल कर बदतर कर दी गई है। श्वेत-पत्र प्रस्तावों के अन्तर्गत फेडरल अपर हाउस के लिये निर्वाचन-क्षेत्र प्रांतीय लोअर हाउस था और चुनाव समानुपातिक प्रणाली और इकहरे हस्तांतरीय मत के ज़रिये होने थे। चूंकि, प्रांतीय लोअर चैम्बरों में दलित वर्गां का प्रतिनिधित्व पर्याप्त बड़ी संख्या में किया जा रहा था, जिससे उन्हें आठ या नौ प्रांतों में किसी भी दर से अपने वर्ग का एक सदस्य पाने का अनिवार्य कोटा मिल सके, इसलिये दलित वर्ग का फेडरल अपर हाउस में आठ या नौ सीट प्राप्त करना सुनिश्चित था। लेकिन संयुक्त संसदीय समिति द्वारा प्रस्तावित फेडरल अपर हाउस की चुनाव प्रणाली में किये गये बदलावों से अब यह संभावना पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है।
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जैसा कि मैंने स्पष्ट किया है, प्रांतीय सैकेण्ड चैम्बर्स में दलित वर्ग का कोई भी प्रतिनिधि नहीं होगा, जो उन प्रांतों के फेडरल अपर हाउस में निर्वाचकों के रूप में काम कर सके जिनमें विधानमंडल (लेजिसलेचर) द्विसदनीय हैं। यदि एकसदनीय प्रांतों में प्रस्तावित निर्वाचकमंडलों को देखें और उनके गठन का परीक्षण करें, तो हम पायेंगे कि दलित वर्गों के लिये किसी विशेष निर्वाचकमंडल का प्रावधान नहीं है, जैसा कि सिक्खों एवं मुसलमानों के मामले में है। न ही कोई ऐसा विशेष प्रावधान है जैसा भारतीय ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों तथा यूरोपियों के लिये भी इस तरह का कोई विशेष प्रावधान नहीं बनाया गया है।
एक-सदनीय प्रांतों में विशेष निर्वाचक मंडलों के गठन के संबंध में समिति का मानना है, ’’ अनारक्षित सीटों पर दलित वर्गों के लिये विशेष प्रावधान के प्रश्न पर, विशेषतः मध्य प्रांतों के संबंध में, खास तौर पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। ’’
यदि मध्य प्रांतों के दलित वर्गों के लिये विशेष प्रावधान आवश्यक है, तो अन्य एक-सदनीय प्रांतों में दलित वर्गों के लिये क्यों नहीं? और यदि एक-सदनीय प्रांतों में दलित वर्गों के लिये विशेष प्रावधान आवश्यक है, तो द्विसदनीय प्रांतों में दलित वर्गों के लिये क्यों नहीं? दलित वर्गों की स्थिति पूरे देश में एक समान ही है और ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मध्य प्रांतों में दलित वर्गों की स्थिति देश के अन्य हिस्सों में रह रहे दलितों से बदतर है।