9. दूसरे चैम्बर के विरुद्ध दलित वर्ग। - Page 239

222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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महत्त्वपूर्ण हितां के विरुद्ध

दलित वर्गां को उनका प्रतिनिधित्व प्रदान कर पाने में असफल रहकर क्या संयुक्त संसदीय समिति ने उनके महत्त्वपूर्ण हितों के विरुद्ध काम किया है? मैं महामहिम की सरकार को याद दिलाना चाहूँगा कि दलित वर्गों ने भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंपने की सहमति इस शर्त पर दी थी, कि नये संविधान के अन्तर्गत देश के विधानमंडलों में उनके प्रतिनिधित्व के लिये पर्याप्त प्रावधान रखा जाएगा। पहले गोलमेज सम्मेलन के पूर्ण सत्र में दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में मैंने अपने भाषण में यह बात पूरी तरह से स्पष्ट कर दी थी। प्रांतीय तथा संघीय सैकेण्ड चैम्बरों में दलित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने में यह चूक उन सबके विचारों के भी विपरीत है, जिन्होंने इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया है।

मुझे पूरा विश्वास है कि प्रधान मंत्री महोदय के विचार, जिन पर दलित वर्ग भरोसा किये बैठे हैं, नये संविधान के निर्माण में अमल में लाये जाने थे, किन्तु संयुक्त संसदीय समिति इन विचारों का सम्मान कर पाने में असफल रही है, जिसकी वजह से प्रांतीय तथा संघीय सैकेण्ड चैम्बरों में प्रतिनिधित्व के मामले में दलित वर्गों के हित बुरी तरह से नज़रंदाज हुए हैं। इसलिये, मैं कहूँगा कि सुधार योजना को अपना समर्थन दे पाना दलित वर्गों के लिये संभव नहीं होगा और मैं यह उम्मीद करता हूं कि महामहिम की सरकार प्रांतीय तथा संघीय सैकेण्ड चैम्बर्स में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के मामले में उनके हितों की रक्षा हेतु संयुक्त संसदीय समिति के प्रस्तावों में सुधार करेगी। मुझे अफसोस के साथ यह कहना पड़ रहा है, कि यदि ये प्रस्ताव इसी प्रकार रहे, तो दलित वर्ग सुधार योजनाओं को अपना समर्थन नहीं दे सकेगे।’’ ख्1,

  1. द टाइम्स ऑफ इंडिया, 15 जनवरी, 1935।