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नासिक, 28 नवम्बर
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’स्मृति’ धर्म का आधार हटाया जाये
’’मतदान योग्यता कम कर दिये जाने से नये संविधान के तहत वास्तविक सत्ता सवर्ण हिन्दुओं के हाथ में चली जायेगी, किन्तु वे सामाजिक सुधार के विरुद्ध हैं। वे मौजू़दा रीति-रिवाज़ों तथा प्रचलनों को बदलने के ज़रा भी इच्छुक नहीं होंगे। मेरी शिकायत विशेष रूप से उनके विरुद्ध है न कि समाज सुधारकों के विरुद्ध यहां तक कि कांग्रेस के उम्मीदवार भी चुनाव नहीं जीत पायेंगे, यदि उन्होंने इस बात की घोषणा कर दी, कि जीतने पर वे अस्पृश्यता को ख़त्म करने के लिये कानून बनायेंगे। मैं कांग्रेस को चुनौती देता हूँ, कि वे इस मुद्दे पर चुनाव जीतकर दिखायें।’’
यह डॉ. अम्बेडकर और नासिक प्रोग्रेसिव हिन्दुओं द्वारा चुने गये शिष्टमंडल के बीच 26 अक्तूबर, 1935 को एक बैठक में बातचीत का सार है।
नासिक प्रोग्रेसिव हिन्दुओं ने अब इस बातचीत का सारांश निकालते हुये एक अधिकृत वक्तव्य जारी किया है।
इस वक्तव्य में कहा गया कि भूतपूर्व एम.एल.सी. श्री आर.जी. प्रधान के नेतृत्व में पाँच उच्च-जातीय प्रगतिशील हिन्दुओं के इस शिष्टमंडल ने 10 नवम्बर को डॉ. अम्बेडकर से उनके निवास पर भेंट की और तीन घंटे से भी अधिक समय तक चली यह बातचीत सौहार्दपूर्ण, मित्रवत् तथा उन्मुक्त भाव से हुई।
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प्रारंभ में शिष्टमंडल ने नासिक हिन्दू प्रोग्रेसिव सिटिज़ंस द्वारा श्री शंकराचार्य (डॉ. कुर्ताकोटि) की अध्यक्षता में हुए एक सम्मेलन में पारित संकल्प डॉ. अम्बेडकर के समक्ष प्रस्तुत किये। ये संकल्प इस प्रकार हैं- (क) ’’सार्वजनिक मंदिरों, यात्रा के सार्वजनिक स्थलों और तीर्थों से संबंधित मुद्दे काफ़ी विवादास्पद तथा तुरन्त व्यवहारिक उपलब्धि के दायरे से बाहर होने की वजह से इस मुद्दे के संबंध में सार्वजनिक दृष्टिकोण बदलने के लिये हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। (ख) इस संबंध में सार्वजनिक दृष्टिकोण में बदलाव लाने के अलावा इस मुद्दे को यहीं रोककर, व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से प्रचार, रचनात्मक कार्यों तथा अन्य माध्यमों द्वारा सतत्