10. ‘‘स्मृति’’ धर्म का आधार हटाएं। - Page 241

224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तथा निर्भीक प्रयास किये जाने चाहियें, जिससे हरिजनों को गै़र-हरिजन हिन्दुओं की बस्तियों में रहने की आज़ादी मिल सके, स्कूल, कुंओं, होटलों, धर्मशालाओं जैसे सार्वजनिक स्थानों से अस्पृश्यता को मिटाया जा सके और कुल मिलाकर, अन्य सभी मामलों में अस्पृश्यता को हिन्दू समाज से निकाल बाहर किया जा सके।’’

श्री प्रधान ने डॉ. अम्बेडकर के प्रति शिष्टमंडल के सदस्यों का गहरा प्रेम तथा सम्मान व्यक्त किया और इस बात की घोषणा की कि येओला में डॉ. अम्बेडकर के भाषण से उत्पन्न हुई समस्या को वे उनके सहयोग तथा परामर्श से हल करने के लिये उत्सुक हैं।

श्री प्रधान ने कहा कि वे सभी डॉ. अम्बेडकर को अपना धर्म-परिवर्तन करने से रोकना चाहते हैं। श्री प्रधान ने डॉ. अम्बेडकर को श्री शंकराचार्य का उनके प्रति गहरा प्रेम सम्प्रेषित किया।

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’स्मृति’ धर्म के आधार को मिटाओ

तीन घंटे से भी अधिक समय तक चली इस बातचीत में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ’’किसी धर्म का पराभौतिक आधार चाहे जो भी हो, जिन धार्मिक सिद्धांतों पर लोगों की नैतिक प्रणाली तथा सामाजिक प्रथाएँ निर्भर करती हैं, उन्हें ही उस धर्म का मुख्य तत्त्व माना जाना चाहिये। यद्यपि, हिन्दुत्व परम ब्रह्म की संकल्पना पर आधारित है, तथापि हिन्दू समुदाय की प्रथाएँ ’मनुस्मृति’ में उल्लिखित असमानता के सिद्धांतों पर आधारित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि समाज के लिये धर्म आवश्यक नहीं। मेरा मत यह नहीं है। मेरा मानना है, कि जीवन और समाज के व्यवहार के लिये धर्म का आधार आवश्यक है। ‘हिन्दू सामाजिक प्रणाली’ के मूल में धर्म है, जैसा कि ’मनुस्मृति’ में बताया गया है। ऐसा होने की वजह से मुझे नहीं लगता कि हिन्दू समाज से असमानता को मिटा पाना संभव होगा, जब तक कि ’स्मृति’ धर्म के मौज़ूदा आधार को हटाकर, उसकी जगह कोई बेहतर नींव न डाली जाये। परन्तु मुझे उम्मीद नहीं है कि हिन्दू समाज किसी ऐसे बेहतर आधार पर अपने धर्म का पुनर्निर्माण कर पायेगा।’’

आगामी संविधान में हरिजनों की स्थिति का जि़क्र करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि नये संविधान के अंतर्गत विधानमंडलों की मदद से सामाजिक सुधार तथा अस्पृश्यता मिटाने के प्रयासों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा।