10. ‘‘स्मृति’’ धर्म का आधार हटाएं। - Page 242

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हिन्दू धर्म छोड़ने के बारे में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ’’व्यक्तिगत रूप से मैं धर्म-परिवर्तन करने के लिये अपना मन बना चुका हूँ। अभी मैं आपको यह नहीं बता सकता कि मैं कौन सा धर्म अपनाऊँगा। किन्तु, मैं धर्म-परिवर्तन के ज़रिये कोई निजी लाभ नहीं पाना चाहता। यह कोई व्यक्तिगत प्रश्न नहीं है और मैं पूरी अस्पृश्य जाति, नहीं तो उसके एक बड़े हिस्से को अपने साथ ले जाना चाहता हूँ। मैं नहीं चाहता कि कुछ लोग कोई एक धर्म या सम्प्रदाय अपनायें तथा अन्य कोई दूसरा। क्योंकि, मैं इस समुदाय को बिखरने नहीं देना चाहता। अपने समुदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए, यह आवश्यक है कि यह समुदाय किसी सशक्त एवं जीवन्त समुदाय में समाये। मेरा इरादा धर्म-परिवर्तन के इस आंदोलन को अखिल भारतीय बनाने का है। यदि मेरा समुदाय मेरा अनुसरण न करें, तो मैं अकेले ही अपना धर्म-परिवर्तन कर लूँगा। इसमें चार से पांच वर्ष तक लग सकते हैं और इस अवधि के दौरान आप लोग जो करना चाह रहे हैं, कर सकते हैं। अंतिम निर्णय लेने से पहले हम इस बात पर ग़ौर अवश्य करेंगे कि आपके प्रयासों को कितनी सफलता मिली है। मैं मानता हूँ, कि आप लोगों के सामने काफ़ी बड़ा काम है। किंतु, यदि यह लक्ष्य प्राप्त करने में बहुत लम्बा समय लगता है, तो इतने लम्बे समय तक इंतज़ार करने के लिये हम तैयार नहीं हैं।’’

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अपने एक नये वर्ग की रचना करने और इसे अन्य लोगों के साथ-साथ समान आधार तथा प्रतिष्ठा के साथ अस्पृश्यों के लिये भी खोल देने के संबंध में डॉ. कुर्ताकोटि द्वारा रखे गये प्रस्ताव के बारे में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ’’मैं किसी नये सम्प्रदाय की शुरुआत करने की जि़म्मेदारी नहीं लूँगा और न ही मैं अपने समुदाय के लोगों को इसमें शामिल होने की सलाह दूँगा। डॉ. कुर्ताकोटि यदि ऐसी इच्छा रखते हों, तो वे नया सम्प्रदाय शुरू करें और इसे स्पृश्य लोगों में प्रसार पाने दें, फिर हम इसके बारे में सोचेंगे। मैं आज यह कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ कि यदि यह सम्प्रदाय स्थापित हो गया, तो हरिजन इसके विषय में क्या सोचेंगे। इसके बारे में उनका दृष्टिकोण इसे अपनाने वाले लोगों की संख्या और इस बात पर निर्भर करेगा, कि यह किस हद तक हरिजन समुदाय के उत्थान को संवर्धन देता है। हम इसे अपनाने या न अपनाने पर फिर बिल्कुल उसी तरह विचार करेंगे, जैसे कि हम किसी अन्य सम्प्रदाय को अपनाने या न अपनाने के विषय में सोच सकते हैं, किंतु यह सम्प्रदाय किसी जीवंत धर्म का ही होना चाहिये।

हमारे बौद्ध धर्म अपनाने के रास्ते में में कुछ कठिनाइयाँ हैं। मेरा मानना है कि हरिजन समुदाय को किसी सशक्त समुदाय में पूरी तरह से समा जाना चाहिये।