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226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इसने आर्य समाज न अपनाने का निर्णय लिया है। सिक्ख धर्म अपनाने के प्रश्न पर हम विचार कर सकते हैं।

हरिजन सेवक संघ के प्रति हरिजनों के दृष्टिकोण के विषय में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ’’हरिजन सेवक संघ द्वारा अस्पृश्यता मिटाने के प्रयास को आगे बढ़ा पाने की संभावना नहीं है। वह संघ काँग्रेस का एक भाग मात्र है।’’

डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा, ’’प्रजातंत्र भारत के लिये उचित नहीं है और लोक­ प्रिय सरकार देश का भला नहीं कर पायेगी। भारत को किसी तानाशाह की ज़रूरत है- कोई कमाल पाशा या मुसोलिनी। मुझे आशा थी कि श्री गांधी एक तानाशाह का स्थान हासिल कर पायेंगे, लेकिन मुझे निराशा हुई। मेरी शिकायत यह नहीं है कि श्री गांधी तानाशाह हैं बल्कि यह है कि वे तानाशाह नहीं हैं। मेरे मन में कमाल पाशा के लिये अथाह सम्मान है, उसी ने तुर्की को एक सशक्त देश बनाया है। मुस्लिम ही वे लोग हैं, जिनके धार्मिक विचारों और रिवाजों में हस्तक्षेप करना सबसे अधिक जोखिम का काम है और कमाल पाशा ने यह सफलतापूर्वक कर दिखाया। कमाल पाशा जैसे सशक्त नेतृत्व के बिना भारत का भला नहीं हो पायेगा। लेकिन इस तरह की परिस्थितियों में, सामाजिक तथा धार्मिक मामलों में ऐसा कोई तानाशाह मिलना असंभव है, इसलिये मैं भारत के भविष्य को लेकर हताश हॅूँ।

युवा पीढ़ी
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युवा पीढ़ी और हरिजनों के रवैये के विषय में बात करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ’’युवा पीढ़ी से भी मुझे कोई उम्मीद नहीं है, जिसका ध्यान पूरी तरह से ऐशो-आराम की तरफ़ है और आदर्शवाद में उसकी कोई खास दिलचस्पी नहीं है। इसलिये इस पीढ़ी में से रानाडे, तिलक या गोखले जैसे आदर्शों तथा सिद्धांतों तथा कार्य करने वाले पुरुष मिलने की कोई संभावना नहीं है। यह सोचकर भी मैं निराशा से भर जाता हूँ।

’’संक्षेप में, अस्पृश्य समुदाय में पैदा होने के नाते मैं इसके हितों के लिये लड़ना अपना पहला कर्तव्य समझता हूँ और भारत के प्रति मेरा कर्त्तव्य इसके बाद आता है। धर्म की मेरी अपनी संकल्पना के अनुसार मेरे ठोस धार्मिक मत हैं, किंतु हिन्दुत्व में मेरा कोई विश्वास नहीं है और आडबंर से मुझे नफ़रत है। इसलिये मैंने हिन्दुत्व त्यागने का फैसला किया है, किन्तु मैं यह तुरन्त नहीं करना चाहता, क्योंकि मैं अपने समुदाय को साथ लेकर चलना चाहता हूँ। हरिजन फौज आज मार्च नहीं कर रही है और वह उचित मौके का इंतजार कर रही है। इस बीच ’स्पृश्य’ लोग आप द्वारा बताए गए मार्ग पर अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।’’ ख्1,

  1. द टाइम्स ऑफ इंडिया, 30 नवंबर, 1935।