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हिन्दुओं को दलित वर्गों
के धर्म-परिवर्तन के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए
धर्म-परिवर्तन के संबंध में, ‘‘डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने विभिन्न प्रांतों में अपने सहकर्मियों से परामर्श किया कि उनके लिये कौन सा धर्म अपनाना उचित रहेगा। अब वे सिक्ख धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे। उनके मित्रों तथा सहकर्मियों का मानना था, कि सिक्ख धर्म अपनाने के लिये डॉ. अम्बेडकर को हिन्दू सभा के नेताओं का समर्थन लेना चाहिये क्योंकि हिन्दू सभा के नेताओं का मानना था कि सिक्ख धर्म कोई पराया धर्म नहीं है। यह हिन्दुत्व की ही संतान है और इसीलिये हिन्दुओं तथा सिक्खों के आपस में विवाह होते थे और सिक्खों को हिन्दू महासभा का सदस्य होने की अनुमति थी।
तद्नुसार, हिन्दू महासभा के प्रवक्ता डॉ. मूँजे को बम्बई आमंत्रित किया गया। दो अन्य मित्रों की उपस्थिति में 18 जून, 1936 को शाम 7.30 बजे डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने राजगृह में डॉ. मूँजे से बात की। डॉ. अम्बेडकर ने सभी मुद्दे स्पष्ट किये और मुक्त रूप से डॉ. मूँजे से बात की। अगले दिन डॉ. अम्बेडकर के विचारों के सारांश को एक वक्तव्य बना कर डॉ. मॅूंजे को सौंपा गया, जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से इसका अनुमोदन किया।’’ ख्1, यह वक्तव्य इस प्रकार है :-
धर्म-परिवर्तन के इस अभियान के प्रति हिन्दू उदासीन नहीं रह सकते, जो दलित-वर्गांं के बीच अब ज़ोर पकड़ता जा रहा है। हिन्दुओं की नज़र में निस्संदेह सबसे अच्छी बात यही होगी कि दलित वर्ग को धर्म-परिवर्तन करने का विचार छोड़ देने के लिए प्रेरित किया जा सके। लेकिन यदि यह संभव नहीं है, तो हिन्दुओं को दलित वर्गों द्वारा उठाये जाने वाले कदम से पूरा सरोकार रखना चाहिये, क्योंकि उनका यह कदम देश के भाग्य पर निश्चित रूप से गंभीर प्रभाव डालने वाला है। यदि दलित वर्गों को धर्म-परिवर्तन न करने के लिये मनाया जा सके और यदि हिन्दू उनका नेतृत्व नहीं कर सकते तो एक ऐसा धर्म अपनाने में, जो हिन्दुओं के लिये और देश के लिये सबसे कम हानिकारक हो, हिन्दुओं को उनकी मदद करनी चाहिए।
- कीर, पृष्ठ 227।