228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस बात संभावना बहुत ही कम है कि दलित वर्ग कोई नया धर्म बनायेंगे। अधिक संभावना इसी बात की है कि वे मौज़ूदा धर्मों में से ही किसी एक को अपनायेंगे। किसी भी तरह से हिन्दू इसी मान्यता के साथ आगे बढ़ सकते हैं। पहला प्रश्न यह है कि दलित वर्गां द्वारा कौन सा धर्म अपनाये जाने की संभावना है? स्पष्ट है कि जो उनके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद हो।
दलित वर्गां के पास चुनने के लिये तीन विकल्प हैं- (1) इस्लाम, (2) ईसाइयत और (3) सिक्ख धर्म। इन तीनों धर्मों की यदि तुलना की जाये तो, इस्लाम दलित वर्गों की सभी आवश्यकतायें पूरी कर सकता है। वित्तीय तौर पर, इस्लाम के पास संसाधन असीमित हैं। सामाजिक तौर पर, मुसलमान भारत में चारों ओर फैले हुये हैं। हर प्रांत में मुस्लिम हैं और वे दलित वर्गों से धर्म-परिवर्तन करके आये नये मुसलमानों की देख-रेख कर सकते हैं और उन्हें हर आवश्यक सहायता प्रदान कर सकते हैं। राजनीतिक तौर पर, दलित वर्गों को वे सभी अधिकार मिलेंगे, जो मुसलमानों को प्राप्त हैं। इस्लाम अपनाने से विधानमंडलों में विशेष प्रतिनिधित्व का अधिकार, सेवाओं में अधिकार जैसे किसी भी राजनीतिक अधिकार की हानि नहीं होगी। ईसाईयत भी इतना ही आकर्षक विकल्प है। यदि भारतीय ईसाइयों की संख्या दलित-वर्गों को धर्म-परिवर्तन के लिये आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के लिये बहुत कम है, तो दलित वर्गों द्वारा ईसाइयत अपनाने की इच्छा ज़ाहिर करने पर अमरीका तथा इंग्लैण्ड जैसे ईसाई देश अपने अथाह संसाधन उडेलने लगेंगे। सामाजिक तौर पर, ईसाई समुदाय की संख्या दलित वर्गों से धर्म-परिवर्तन करके आने वालों की मदद के लिए काफी कम है, लेकिन ईसाई धर्म को सरकार का समर्थन प्राप्त है। राजनीतिक तौर पर, ईसाई धर्म भी उन्हें वे सब अधिकार प्रदान करेगा जो इस्लाम। मुसलमानों की ही तरह भारतीय ईसाइयों को भी संविधान द्वारा सेवाओं तथा विधानमंडलों में विशेष प्रतिनिधित्व के राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं। इस्लाम तथा ईसाइयत के मुकाबले सिक्ख धर्म कम आकर्षक है। केवल 40 लाख की जनसंख्या वाला छोटा सा समुदाय होने के कारण सिक्ख वित्तीय सहायता प्रदान नहीं कर सकते। सिक्ख केवल पंजाब तक सीमित हैं और जहाँ तक अधिकांश दलित वर्गों का सवाल है, सिक्ख उन्हें कोई सामाजिक समर्थन नहीं दे पायेंगे। राजनीतिक तौर पर भी सिक्ख धर्म अपनाने में इस्लाम तथा ईसाईयत की तुलना में नुकसान है, क्योंकि, पंजाब से बाहर सिक्खों को सेवाओं तथा विधानमंडलों में विशेष प्रतिनिधित्व का राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
दूसरा प्रश्न यह है कि शुद्ध रूप से हिन्दुओं के दृष्टिकोण से देखे जाने पर इस्लाम, ईसाइयत या सिक्ख धर्म में से कौन-सा श्रेष्ठ है। ज़ाहिर है, सिक्ख धर्म