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सबसे अच्छा है। यदि दलित वर्ग इस्लाम या ईसाइयत अपनाते हैं, तो वे न केवल हिन्दू धर्म से बाहर हो जायेंगे, बल्कि हिन्दू संस्कृति से भी बाहर हो जायेंगे। दूसरी ओर, यदि वे सिक्ख धर्म अपनाते हैं, तो वे हिन्दू संस्कृति के भीतर ही रहेंगे। यह हिन्दुआें के लिये कोई कम फ़ायदे की बात नहीं है।
धर्म-परिवर्तन के परिणामस्वरूप, देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है। इस्लाम या ईसाइयत अपनाने से दलित वर्ग राष्ट्रियता से वंचित हो जायेंगे। यदि वे इस्लाम अपनाते हैं तो मुस्लिमों की संख्या दोगुनी हो जायेगी और मुस्लिम प्रभुत्व का खतरा भी सच हो जायेगा। यदि वे ईसाइयत अपनाते हैं, तो ईसाइयों की संख्या पांच से छः करोड़ हो जायेगी। इससे देश में अंग्रेजों की पकड़ मज़बूत होने में सहायता मिलेगी। दूसरी ओर, यदि दलित वर्ग सिक्ख धर्म अपनाते हैं, तो वे देश के प्रारब्ध को कोई नुकसान नहीं पहुॅचायेंगे, बल्कि इसे सहायता ही प्रदान करेंगे। उनका विराष्ट्रीयकरण भी नहीं होगा। इसके विपरीत, वे देश की राजनीतिक प्रगति में सहायता प्रदान करेंगे। इस प्रकार यह देश के हित में होगा कि दलित वर्ग यदि अपना धर्म-परिवर्तन करना चाहते हैं, तो उन्हें सिक्ख धर्म अपनाना चाहिये।
तीसरा प्रश्न यह है कि यदि दलित वर्गों का सिक्ख धर्म अपनाना हिन्दुओं के हित में है, तो क्या हिन्दू सिक्ख धर्म को भी दलित-वर्गों के लिये उतना अच्छा विकल्प बनाने के लिये तैयार हैं, जितने इस्लाम तथा ईसाई धर्म हैं? यदि हाँ, तो ज़ाहिर है, उन्हें उन कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करना चाहिये जो इस्लाम तथा ईसाई धर्म अपनाने के मुकाबले सिक्ख धर्म अपनाने में सामने आ रही हैं। ये अभाव वित्तीय, सामाजिक तथा राजनैतिक हैं। हिन्दू सिक्खों को सामाजिक कठिनाई दूर करने में सहायता प्रदान नहीं कर सकते, किंतु वे वित्तीय तथा राजनीतिक कठिनाई दूर करने में अवश्य सहायता कर सकते हैं। इनमें से राजनीतिक कठिनाई दूर करना सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि यह सिक्खों के रास्ते में बाधा बन सकती है। सौभाग्य की बात यह है कि राजनीतिक कठिनाई का समाधान एक बहुत छोटा-सा मुद्दा है। करना सिर्फ़ यह होगा कि पंजाब के अलावा हरेक प्रांत में अनुसूचित जातियों की सूची में ’सिक्ख’ शब्द जोड़ देना होगा, जिससे दलित वर्ग का जो व्यक्ति धर्म-परिवर्तन करके सिक्ख बने उसके राजनीतिक अधिकार उसी प्रकार बने रहें, जैसे दलित वर्ग में होने पर थे। कम्यूनल अवार्ड के अंतर्गत, समुदायों को अवार्ड में कोई भी बदलाव स्वीकार करने की स्वतंत्रता दी गई है और सरकार भी इन स्वीकृतियों के अनुसार अवार्ड में परिवर्तन करने के लिये प्रतिबद्ध है।
इसलिये, यदि हिन्दू दलित वर्गां के साथ परस्पर सहमति करके यह बदलाव लाना चाहें, तो यह बदलाव आसानी से लाया जा सकता है। इससे पूना संधि में भी कोई