230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बड़ा परिवर्तन नहीं होता। इससे सीटों के प्रभाजन की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। पूना संधि के अंतर्गत दलित वर्गों को दी गई सीटों की संख्या भी समान ही रहेगी। परिवर्तन केवल यह होगा, कि गै़र-सिक्ख दलित वर्ग और वे वर्ग दलित जिन्होंने सिक्ख- धर्म अपनाया है, दोनों प्रतिस्पर्धा के लिये स्वतंत्र होंगे। इससे सिक्ख-धर्म अपनाने वाले दलित वर्गों की मात्र एक कठिनाई ही दूर होती है।
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जवाब देने चाहिएः
पूना संधि के अंतर्गत दलित वर्गां को दी गई सीटें वापस हिन्दुओं के पास नहीं जा सकतीं। यदि दलित वर्ग धर्म-परिवर्तन करके इस्लाम या ईसाई धर्म अप नाते हैं, तो ये सीटें मुसलमानों या ईसाइयों को चली जायेंगी, क्योंकि यदि दलित वर्गों के धर्म-परिवर्तन से मुसलमानों या ईसाइयों की संख्या बढ़ जाती है, तो मुसलमानों तथा ईसाई निश्चित तौर पर विधानमंडल में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग करेंगे। इस प्रकार, ये सीटें अगर जानी ही हैं, तो क्यों न इन्हें सिक्खों के पास जाने दिया जाये?
संविधान के अंतर्गत दलित वर्ग यदि इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने से अपने राजनैतिक अधिकार नहीं खोते हैं, तो सिक्ख बनने पर उन्हें अपने राजनैतिक अधिकार क्यों खोने पडं़े? यह तो इस्लाम या ईसाइयत अपनाने पर इनाम और सिक्ख धर्म अपनाने पर सज़ा जैसा है। यह दलित वर्गां को मुसलमानों या ईसाइयों के खेमें में जाने पर मजबूर कर रहा है। क्या ऐसा होने देना हिन्दुओं के हित में है?
ऐसा हो सकता है कि दलित वर्ग सिक्ख धर्म अपनाने पर अपने राजनैतिक अधिकार न खोयें, क्योंकि ‘पूना संधि अनुसूचित जाति परिषद्-आदेश’ के अंतर्गत भी दलित वर्गों के विशेष प्रतिनिधित्व के अधिकार उनके हिन्दू धर्म को मानने या न मानने पर निर्भर नहीं किये गये हैं। उनके प्रतिनिधित्व को उनके कुछ विशिष्ट जाति या कबीले का सदस्य होने पर निर्भर रखा गया है। लेकिन सिक्खों को हिन्दुओं के प्रति मन-मुटाव रखने और शिकायत का मौका क्यों दिया जाये?
राजनीतिक मान्यता के लिये विभिन्न प्रांतों में सिक्खों को ’अनुसूचित जाति’ की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव कोई सशक्त प्रस्ताव नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, ऐसी कोई मान्यता न देना विचित्र ही लगेगा।
यदि पंजाब में राजनीतिक उद्देश्य से सिक्खों को मान्यता दी जा सकती