232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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धर्म-परिवर्तन की स्थिति में अधिकार प्रभावित नहीं
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने हिन्दू समुदाय छोड़ने की स्थिति में पूना संधि के अंतर्गत दलित वर्गां द्वारा अपने राजनैतिक अधिकार छोड़ देने की संभावना पर बातचीत को अस्वीकार किया है और वे इसे काँग्रेस की उन्हें तथा उनका पार्टी को चुनाव लड़ने से रोकने का एक कारनामा मानते हैं।
’’मेरे पास इस बात के सबूत मौजू़द हैं कि यह काँग्रेस का मुझे तथा मेरी पार्टी को डराने का एक कारनामा है, जिससे हम आगामी चुनाव में न उतरें और हिन्दू समुदाय के भीतर रहने पर मजबूर हो जायें।’’
यह शहर में प्रचलित उन रिपोर्टों पर डॉ. अम्बेडकर की प्रतिक्रिया है, जिनमें कहा जा रहा है, कि दलित वर्गों के येओला तथा बम्बई सम्मेलनों के संकल्प और डॉ. अम्बेडकर द्वारा हिन्दुत्व छोड़ने के अपने इरादे की घोषणा पूना संधि के अंतर्गत प्राप्त हुए विशेषाधिकारों पर दलित वर्गों की प्रसन्नता के विरुद्ध हैं।
डॉ. अम्बेडकर को इन रिपोर्टों पर हँसी आती है, क्योंकि उनकी राय में ये पूना संधि द्वारा संशोधित साम्प्रदायिक अधिनिर्णय अवार्ड के प्रावधानों तथा संवैधानिक स्थिति की अनभिज्ञता पर आधारित हैं।
दलित वर्गों के संबंध में साम्प्रदायिक अधिनिर्णय का वास्तविक प्रावधान यह था कि उन्हें सामान्य चुनाव क्षेत्रों में ही वोट डालने होंगे, लेकिन उनके लिये पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उन्हें विशेष सीटें आबंटित की गई थीं, इस प्रावधान का आधार दलित वर्गों के लिये एक विशेष चुनाव क्षेत्र था।
संक्षेप में, पूना संधि में हिन्दू समुदायों के साथ संयुक्त निर्वाचकमंडलों को दलित वर्गों के लिये अलग निर्वाचकमंडलों से बदल दिया गया। यह सुनिश्चित करने के लिये कि दलित वर्गों के प्रतिनिधियों के साथ अपने समुदाय का पूरा विश्वास हो, समुदाय द्वारा प्राथमिक चुनाव के लिये स्वयं एक युक्ति विकसित की गई-संयुक्त हिन्दू समुदाय के निर्वाचक मंडलों को दलित वर्गों की सूची में मौजूदा मतदाताओं द्वारा प्रत्येक सीट के लिये चुने गये चार उम्मीदवारों के पैनल में से अपना उम्मीदवार चुनना था।