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पूना संधि : हिन्दुओं का तर्क
हिन्दू समुदाय द्वारा अब उठाया जा रहा प्रमुख मुद्दा यह है कि जिन परिस्थितियों में पूना संधि हुई थी, उनमें निस्संदेह यह माना गया था कि दलित वर्ग हिन्दू समुदाय का ही हिस्सा रहेंगे। श्री गांधी इस संधि के लिये अकेले जिम्मेदार हैं जो उन्होंने हिन्दू समुदाय को विभाजन से बचाने के लिये ही अनशन किया था, क्योंकि दलित वर्गों को अलग निर्वाचकमंडल आबंटित किये जाने के परिणामस्वरूप, इस विभाजन की आशंका प्रकट की जा रही थी।
यह तर्क दिया गया कि पूना संधि में हिन्दू समुदाय ने त्याग किये हैं और दलित वर्गों को हिन्दू समुदाय में बनाये रखने और उनकी आशंकायें कम करने के एकमात्र उद्देश्य के साथ उसने वास्तविक अवार्ड के अंतर्गत स्वयं को आबंटित सीटों में से कुछ लौटा दी थीं।
हालांकि, तब से दलित वर्गों का एक हिस्सा डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में हिन्दू धर्म त्यागने का संकल्प ले चुका है। उदाहरण के लिये, बम्बई महार सम्मेलन ने संकल्प लिया कि गहन सोच-विचार के बाद सम्मेलन :
(क) घोषणा करता है कि महार समुदाय के पास समानता तथा स्वतंत्रता प्राप्त
करने के लिये धर्म-परिवर्तन ही एकमात्र उपाय है,
(ख) अपने माननीय नेता, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को विश्वास दिलाता है कि
समुदाय सामूहिक रूप से अपना धर्म-परिवर्तन करने के लिये तैयार है,
और
(ग) महार समुदाय से आग्रह करता है कि धर्म-परिवर्तन के शुरुआती कदम
के रूप में वे अब से हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा न करें, हिन्दू पर्व व
त्यौहार न मनायें और हिन्दू पवित्र स्थानों पर जाना बंद कर दें।
कट्टरपंथी दृष्टिकोण
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कट्टरपंथी हिन्दू दृष्टिकोण के अनुसार, इस संकल्प के बाद हिन्दू समुदाय के प्रति महारों के इरादों के विषय में कोई संदेह नहीं रह जाता और इसलिये वे उन चुनावी विशेषाधिकारों से वंचित किये जाने पर कोई शिकायत नहीं कर सकते, जो कि उन्हें हिन्दुओं द्वारा पूरी तरह से यह मान कर दिये गये थे कि वे हिन्दू ही रहेंगे।
दूसरे शब्दों में, जैसा कि हाल ही में एक काँग्रेसी नेता ने कहा है, ’’चित भी उनकी और पट भी उनकी’ नहीं हो सकती। या तो वे हिन्दू रहें और पूना संधि के अंतर्गत विशेषाधिकार पायें या फिर वे हिन्दू न रहें और उन विशेषाधिकारों को छोड़ दें।’’