12. धर्म परिवर्तन की दशा में, अधिकार प्रभावित नहीं होते। - Page 251

234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपने दृष्टिकोण से स्थिति स्पष्ट करने के लिये आमंत्रित किये जाने पर, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक प्रतिनिधि के साथ विशिष्ट साक्षात्कार में डॉ. अम्बेडकर ने इस तर्क का खंडन किया कि हिन्दू समुदाय ने दलित वर्गों के लिये कोई त्याग किया है।

उन्होंने कहा, ’’यह मानना गलत है कि कट्टरपंथी हिन्दुओं ने दलित वर्गों के पक्ष में कोई सीट छोड़ी है। वास्तव में, हिन्दू सीट या हिन्दू निर्वाचन क्षेत्र जैसी कोई चीज़ है ही नहीं, यह केवल एक सामान्य चुनाव-क्षेत्र है।’’

डॉ. अम्बेडकर के अनुसार, संविधान में किसी हिन्दू चुनाव-क्षेत्र को मान्यता नहीं दी गई है, यद्यपि मुसलमानों, यूरोपियों, आंग्ल-भारतीयों, सिक्खों (पंजाब में) इत्यादि के लिये अलग-अलग चुनाव क्षेत्र हैं। अनारक्षित चुनाव-क्षेत्रों में केवल हिन्दू ही नहीं, बल्कि पारसी, ज्यू, जैन, बौद्ध तथा कई अन्य समुदाय भी आते हैं। पूना संधि के अंतर्गत दलित वर्गों को यदि कोई रियायत दी भी गई है, तो वह अनारक्षित चुनाव क्षेत्र से है, न कि किसी ‘हिन्दू चुनाव-क्षेत्र’ से, क्योंकि इस नाम की कोई चीज़ मौजूद ही नहीं है। इस तरह के किसी चुनाव-क्षेत्र का जि़क्र न तो साम्प्रदायिक अधिनिर्णय में है, न ही पूना संधि में, यहां तक कि भारत सरकार अधिनियम, 1935 में भी इसका कोई जि़क्र नहीं है, जो मताधिकार तथा निर्वाचन प्रक्रिया को संचालित करता है।

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अब इस मुद्दे पर प्रश्न उठाने का समय नहीं रहा

डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि भारत सरकार अधिनियम द्वारा अपनाये गये निर्वाचन-क्षेत्रों के वर्गीकरण के औचित्य पर प्रश्न उठाने के लिये अब बहुत देर हो चुकी है। ’’यह जैसा भी है, इसे मानना पड़ेगा। यहाँ तक कि पंजाब में जहाँ मुसल­ मानों की संख्या अधिक है और हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, वहाँ भी मुसलमानों के लिये एक अलग निर्वाचन-क्षेत्र है और हिन्दुओं के लिये आम निर्वाचन-क्षेत्र ही है।’’

इस प्रकार, डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ’’यह मानना गलत और अनिष्टकारी है कि हिन्दुओं ने कोई बलिदान किया है, क्योंकि यदि ऐसा है, तो अनारक्षित चुनाव-क्षेत्रों में आने वाले अन्य कई समुदायों ने भी दलित वर्ग को यह तथा-कथित रियायत दी है।’’