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डॉ. अम्बेडकर द्वारा कही गई अगली महत्त्वपूर्ण बात यह है कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय पूना संधि तथा भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत की गई रा जनैतिक व्यवस्थाओं का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यूरोपीय निर्वाचन-क्षेत्रों में यूरोपीय शामिल हैं, चाहे उनका धार्मिक विश्वास जो भी है, आंग्ल-भारतीय मामले में भी ऐसा ही है। केवल मुस्लिम समुदाय के मामले में ही राजनीतिक वर्गीकरण धार्मिक समूहों के आधार पर है। स्वयं अनारक्षित चुनाव-क्षेत्रों में भी इस श्रेणी के अंतर्गत आने वालों को राजनीतिक अधिकार उनके धार्मिक विश्वास की समानता के आधार पर नहीं दिये गये हैं।
मताधिकार व्यवस्थाएँ
| erkfèkdkj | Col2 | Col3 | Col4 | Col5 |
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दूसरे शब्दों में, मताधिकार व्यवस्थायें किसी विशेष धार्मिक विश्वास से जुड़े होने की बजाय किसी समुदाय विशेष की सदस्यता के आधार पर की गई हैं। ’’दलित वर्गों’’ का मूल वर्गीकरण बदलकर अब ’’अनुसूचित जाति’’ कर दिया गया है और यह समुदाय की एक शाखा की ओर इंगित करता है, जिसका वर्गीकरण सामाजिक तथा आर्थिक नज़रिये से किया गया है, न कि किसी धार्मिक दृष्टिकोण से।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि, यदि केवल तर्क के लिये यह मान भी लिया जाये कि इन वर्गीकरणों में धर्म का पुट मौजूद है, तब भी किसी धर्म का त्याग करना या किन्हीं सिद्धांतों पर से विश्वास उठने की घोषणा करना किसी मौजूदा राजनैतिक अधिकार का उपयोग करने के विरुद्ध नहीं है।
यदि दलित वर्ग का कोई सदस्य हिन्दुत्व त्याग देता है और वास्तव में कोई और धर्म जैसे इस्लाम या ईसाइयत अपना लेता है, तब यह एक अलग मामला हो सकता है।
तब, और केवल इस तरह से धर्म-परिवर्तन के बाद ही, वह उस राजनीतिक समूह के अंतर्गत आयेगा, जो उस धर्म को मानने वालों को दिया गया है, केवल तभी उसे हिन्दू समुदाय की सदस्यता से जुड़े अधिकार त्यागने पर बाध्य किया जा सकता है।
डॉ. अम्बेडकर पूछते हैं, यदि कोई हिन्दू वेदों पर विश्वास न रखता हो तो? आज भारत में कई हिन्दू ऐसे हैं, जो केवल नाम के लिये हिन्दू हैं और जो हिन्दू होने के लिये आवश्यक असंख्य धार्मिक अनुष्ठानों तथा औपचारिकताओं को नहीं मानते। क्या वे उस वजह से हिन्दू नहीं कहलाते? और, वह कौन सा मानक है, जिसके ज़रिये किसी हिन्दू के उसके धर्म पर विश्वास की सीमा मापी जाती है?