236 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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अन्याय की मौजूदा रीतियों के साथ विरक्ति से जन्में किसी धार्मिक सम्प्रदाय को छोड़ने का इरादा उस धर्म से किसी व्यक्ति का संबंध नहीं तोड़ सकता, जो वह नाममात्र को अपना रहा हो।
’’निश्चित रूप से, आज के सभी ईसाई सच्चे ईसाई नहीं हैं। यूरोप में उन रविवारीय परेडों के विषय में आप क्या कहेंगे, जिनमें ईसाइयत को न मानने वाले या इसके प्रति उदासीन या तर्कवादी लोग रविवार की सुबह गिरिजाघरों के आगे प्रदर्शन करते हैं? इस सबके बावजूद भी वे राज्य की नज़र में ईसाई हैं।
डॉ. अम्बेडकर ने हास्यपूर्ण ढंग से कहा, ’’आप चाहें तो मुझे वैधानिक हिन्दू कह सकते हैं, लेकिन मैं अपने राजनैतिक अधिकारों पर दृढ़ रहूँगा, चाहे मेरी धार्मिक भावप्रवणता की गहराई कितनी भी हो।’’
अपने तर्क को समर्थन देने के लिये डॉ. अम्बेडकर ने पंजाब से दो उदाहरण दिये, जहां दलितों के दो वर्ग यह प्रमाणित होने के बावजूद भी कि वे हिन्दू नहीं हैं, ’’अनुसूचित जाति’’ के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं। जो उदाहरण दिये गये वे आदर्मियों तथा रामदासियों के हैं। आद-धर्मियों ने तो औपचारिक रूप से सरकार को सूचित किया कि वे हिन्दू नहीं हैं और तब भी वे आम निर्वाचन-क्षेत्र में ’’अनुसूचित जाति’’ के अंतर्गत रखे गए हैं।
1931 की पंजाब जनगणना रिपोर्ट में कहा गया है :
‘‘कई चमारों तथा शूद्रों और अन्य अस्पृश्यों द्वारा ’’आद-धर्म’’ नाम के शब्द का प्रयोग धर्म के विवरण की दृष्टि से वर्तमान जनगणना की सबसे उल्लेखनीय विशेषता रही है। धर्म को इस वर्ष एक नया निर्देश दिया गया कि ‘जो लोग स्वयं को आद-धर्मी घोषित कर रहे हैं, उन्हें इसी नाम से रिकॉर्ड किया जाये।’
’’पंजाब आद-धर्म मंडल ने 1930 में जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने से पहले पंजाब सरकार से निवेदन किया था कि दलित वर्गों को जनगणना के समय आद-धर्म को अपना धर्म लिखने की अनुमति दी जाये, क्योंकि वे भारत के अदिवासी हैं और चूंकि हिन्दुओं ने उनसे हमेशा ही पर्याप्त दूरी बनाए रखी है, इसलिए उनका हिन्दू धर्म पर कोई विश्वास नहीं है। पंजाब के धर्म मंडल के अध्यक्ष को सूचित किया गया था कि जनगणना संहिता में एक खण्ड उपलब्ध कराया जा रहा है, कि जो लोग आद-धर्म को अपना धर्म घोषित करेंगे उन्हें उसी तरह रिकॉर्ड किया जायेगा। आद-धर्म का शाब्दिक अर्थ है ’मौलिक’ या ’पुरातन’ धर्म।’’