238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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अस्पृश्यों के धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध राय बहादुर एम.सी. राजा के वक्तव्य पर डॉ. अम्बेडकर की टिप्पणियाँ :-
सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूँगा कि इस पत्र-व्यवहार को प्रकाशन के लिये समाचार-पत्रों को भेजना ही अपने-आप में श्री राजा का एक अभद्र कृत्य है। डॉ. मूँजे ने अपने पत्र के अंत में स्पष्ट रूप से यह कहा था कि धर्म-परिवर्तन पर अंतिम निर्णय लिये जाने तक इस पत्र को निजी एवं गोपनीय समझा जाये। यह नहीं माना जा सकता कि यह तथ्य श्री राजा की नजर में न आया हो। इस पत्र-व्यवहार को प्रेस में जारी करने से पहले श्री राजा को डॉ. मूँजे की अनुमति लेनी चाहिये थी। श्री राजा द्वारा किया यह कृत्य किसी भद्र व्यक्ति के लिए शोमभनीय नहीं है।
अस्पृश्य धर्म-परिवर्तन के लिये सिक्ख धर्म को चुन सकते हैं। यह तथ्य मेरे कई हिन्दू मित्र और अस्पृश्य समुदाय के वे सदस्य जानते हैं, जो अस्पृश्यों द्वारा धर्म-परिवर्तन के विषय में गंभीर दिलचस्पी रखते हैं।
अस्पृश्यों के सिक्ख धर्म अपनाने की संभावना के संबंध में राय बहादुर एम.सी. राजा और डॉ. मूँजे के बीच हुआ पत्र-व्यवहार अखबारों में छपा है। मैंने इसे पढ़ा है।
राजा के लिये इसमें खुश होने की कोई बात नहीं है, कि उन्होंने डॉ. अम्बेडकर का कोई बड़ा रहस्य उजागर कर दिया। मैं श्री राजा के पत्रों को कोई महत्त्व नहीं देता। मेरी नजर में श्री राजा के लिये अस्पृश्य जनता में कोई खास सम्मान नहीं है और न ही धर्म-परिवर्तन के विषय में उनके विचारों का कोई खास मूल्य है। अगर मुझे लगता कि उनके विचारों का जरा भी मूल्य है, तो मैं उनकी सोच बदलने में उन्हें सहयोग देता।
राय बहादुर राजा की उपेक्षा करते हुये, मुझे और राय बहादुर श्रीनिवासन को अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिये गोलमेज सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था। इससे राजा के मन में मेरे प्रति जलन और द्वेष की भावना आ गई और वे तब से लगातार मेरी आलोचना और विरोध कर रहे हैं।
मैं अपने लोगों को सेवायें प्रदान करने का प्रयास कर रहा हूँ। श्री राजा मेरा विराध कर रहे हैं और मेरे काम में गलतियाँ निकाल रहे हैं। साथ ही उन्होंने समाचार-पत्रों के माध्यम से स्व-प्रचार की कला भी हासिल कर ली है। मैं इस प्रश्न को खास