13. धर्म परिवर्तन का आन्दोलन स्वार्थी हेतु से मुक्त होता है। - Page 256

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महत्त्व नहीं देता, लेकिन फिर भी यह मेरी समझ से बाहर है कि दलित वर्गों द्वारा हिन्दुत्व का त्याग करने और कोई अन्य धर्म अपनाने हेतु चलाये गये अभियान से श्री राजा को क्या नुकसान है? यदि श्री राजा हिन्दू धर्म का त्याग नहीं करना चाहते, तो उन्हें ऐसा करने के लिये कोई बाध्य नहीं करने वाला और इसीलिये उन्हें भी इस पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। श्री राजा का कहना है, ’’मैं हिन्दू बनकर जिऊॅँगा और हिन्दू ही मरूँगा।’’ वे ऐसा करने के लिये आज़ाद हैं। लेकिन मैं उन्हें एक बात कहना चाहूँगा कि प्रेस में वक्तव्य जारी करने में अपनी कुशलता का प्रयोग करके वे हिन्दू धर्म के लिये अपना प्रेम प्रदर्शित करते रहे हैं, लेकिन जब तक वे किसी और धर्म को नहीं अपनाते वे एक ’परियाह’ बनकर जीते रहेंगे और ’परियाह’ ही मरेंगे। उन्हें यह तथ्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिये, कि यदि वे हिन्दू समुदाय में ही बने रहे तो उनकी जाति की वजह से अस्पृश्यता का जो दाग उन पर लगा हुआ है वह मिटने वाला नहीं। यह कहना तो समझदारी नहीं है कि धर्म परिवर्तन केवल आध्यात्मिक कारणों से किया जाना चाहिए। मैं श्री राजा से पूछना चाहॅूँगा कि क्या वे केवल आध्यात्मिक कारणों से हिन्दू समुदाय में बने रहना चाहते हैं। यदि उनकी आध्यात्मिक संतोष के अलावा और कोई आकांक्षा नहीं है, तो उन्हें विधान-मंडल में सीटों के आरक्षण से हासिल होने वाले राजनैतिक तथा भौतिक लाभों की चिंता नहीं करनी चाहिये। यदि वे हिन्दू बनकर जीने और हिन्दू बनकर मरने के इतने इच्छुक हैं, तो वे आरक्षित सीटों की कामना क्यों करते हैं?

मैं समझता हूँ कि श्री गांधी और श्री मालवीय में अस्पृश्यों के धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध कुछ कहने का नैतिक साहस नहीं है। वे पूना संधि पर हस्ताक्षर करते समय किये गये वायदों को पूरा कर पाने में असफल रहे हैं।

श्री गांधी का कहना है कि मेरा निर्णय उनकी समझ से बाहर है। मैं भी यही कहूँगा कि उनकी भाषा और कार्य मेरे लिये समझना मुश्किल हैं। उनके अनुसार ’अस्पृश्यों का उद्धार एक स्वतंत्र प्रश्न है। यदि इस तरह की भाषा, जो कि गांधी जी द्वारा प्रयोग की जाती है, किसी संत द्वारा प्रयोग की जाये, तो वे आपस में इसे बेहतर समझ सकते हैंं। लेकिन मेरे जैसे साधारण इंसान के लिये, जो अपनी रोजमर्रा की जि़न्दगी में समाज के साधारण सिद्धांतों पर चलता है, गांधी जी की गणितीय भाषा का कोई अर्थ नहीं है। गांधी जी का कहना है कि धर्म कोई वस्तु नहीं है, जिसकी अदला-बदली की जाये। मेरा जवाब यह है कि गांधी द्वारा इतने दिनों बाद इस तरह का वक्तव्य दिया जाना उचित नहीं है। पूना संधि के समय श्री गांधी ने स्वयं ही ’एक हाथ दे, एक हाथ ले’ के सिद्धांत को स्वीकार किया था। वे दिन लद गये जब अपनी भूख मिटाने और रोटी तथा पानी जैसी साधारण मौलिक आवश्यकताओं