240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को पूरा करने के लिये संघर्ष करने वाले लोगों की आँखों पर मात्र आध्यात्मिक शांति पाने हेतु जीने के लिए पट्टी बांधी जा सकती थी।
गांधी का कहना है कि अस्पृश्य अपने धर्म का सौदा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि धर्म-परिवर्तन का यह अभियान किसी निजी लाभ या स्वार्थपूर्ण उद्देश्य के साथ नहीं छेड़ा गया। गांधी के अनुसार, हिन्दुओं को स्वयं ही प्रायश्चित करना चाहिये और स्वेच्छा से अस्पृश्यता को मिटाने का प्रयास करना चाहिये। अस्पृश्यों को अपने उत्थान तथा अस्पृश्यता मिटाने के लिये स्वयं कुछ करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। अस्पृश्यों को केवल हाथ जोड़कर बैठ जाना चाहिये और प्रार्थना करनी चाहिए कि ’हे भगवान! हिन्दुओं को बुद्धि, साहस और प्रकाश दो, जिससे उन्हें उनके दुष्कर्मों के लिये क्षमा किया जा सके। उनके पाप क्षमा कर दो और उन्हें अपने समाज के सुधार के लिये ज्ञान तथा शक्ति प्रदान करो।’ यह अस्पृश्यों के लिये गांधी जी की पवित्र सलाह है। ये थोथी उक्तियाँ किसी का भला नहीं कर सकतीं, न ही इनसे समस्या हल हो सकती है। कोई भी समझदार व्यक्ति इस तरह के प्रस्ताव से कभी सहमत नहीं होगा। यह प्लेग जैसी महामारी से ग्रस्त क्षेत्र में रह रहे लोगों को किसी मूर्ख द्वारा दी गई इस सलाह जैसा है, ’’भाइयो, रुको और मेरी बात सुनो! इस रोग से मत डरो। म्यूनिसिपल कमेटी के कर्मचारियों को अपने कर्त्तव्यों में की गई लापरवाही के लिये एक दिन जरूर प्रायश्चित करना होगा; प्लेग उन्मूलन के लिये कोई योजना निश्चित रूप से तैयार की जायेगी। तब तक आप लोग इंतजार करो। घर और चूल्हा छोड़ने की जल्दी मत करो।’’ इस सलाह में आपको जो बुद्धिमानी नज़र आती है, उसी तरह की सलाह गांधी द्वारा अपने वक्तव्यों में अस्पृश्यों को दी गई है।
श्री राजगोपालाचारी को तो लगता है गुस्से का एक और दौरा पड़ गया है। इस वृद्धजन को तो लगता है कि पैने-निरर्थक शब्दों, जो कि गढ़ते रहने की इन्हें आदत है, के अत्यधिक प्रयोग से अपाचन हो गया है। इन्होंने तो धर्म-परिवर्तन के इस अभियान को ’शैतानी’ करार दे दिया है।
यदि अस्पृश्य लोग वास्तव में सिक्ख धर्म अपनाने की बात सोच रहे हैं, कि हिन्दू धर्म के अनुयायियों को स्वयं यह सोचना चाहिये कि क्या वास्तव में अस्पृश्यों का यह कदम ’शैतानी’ है। मेरा मानना है कि जो हिन्दू हिन्दुत्व के भविष्य के विषय में वस्तुतः में चिंतित हैं, वे अवश्य विस्मित हो रहे हांगे कि क्या सिक्ख धर्म अपनाने को ’शैतानी’ क़दम कहने वाले महान हिन्दू ब्राह्मण राजगोपालचारी का दिमाग ठिकाने नहीं है।