खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 26

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कि उनको उच्च वर्ग के हिन्दुओं के प्रति घृणा को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। इसके अनुसरण में विषय-समिति ने अन्य बातों के साथ-साथ एक संकल्प का मसौदा तैयार किया जिसमें यह निर्धारित किया गया कि उच्च वर्ग के हिन्दुओं को दलित वर्गों के उन्नयन के लिए क्या-क्या करना चाहिए। विषय-समिति में कुछ लोगों ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि महाद में दलित वर्गों को पीने के लिए पानी प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई है। यह कठिनाई न केवल महाद के निवासी दलित वर्गों द्वारा ही महसूस की गई बल्कि गांवों के उन दलित वर्गों द्वारा भी महसूस की गई जो महाद में निजी व्यापार अथवा सरकारी काम के लिए जाया करते थे। यह कमी इतनी अधिक थी कि सम्मेलन की आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु प्रतिदिन 15 रुपए का पानी खरीदना पड़ता था। महाद की नगरपालिका ने कुछ समय पूर्व एक प्रस्ताव पास किया था जिसमें शहर के टैंकों को जनता के लिए खुला घोषित किया गया था, परंतु चूंकि उसने वहां इस संबंध में कोई बोर्ड नहीं लगाया था, अतः लोग उन टंकियों (टैंकों) पर जाने से डरते थे। अतः विषय -समिति ने सम्मेलन में आये उच्च वर्गों की इस मामले में राय लेकर निर्णय लिया कि सम्मेलन को स्वयं चौदार टैंक पर जाना चाहिए और दलित वर्गों के पानी लेने के अधिकार को स्थापित करने में उनकी सहायता करनी चाहिए।

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अतः, जब 20 तारीख की सुबह सम्मेलन की बैठक हुई और पहले उस संकल्प को, जिसमें यह घोषणा की गई थी कि उच्च वर्गों को दलित वर्गों के लिए क्या करना चाहिए, दलित वर्गों के सदस्यों द्वारा सम्मेलन के समक्ष रखा गया, तो अध्यक्ष ने सर्वश्री पुरूषोत्तम प्रभाकर जोशी और गोविंद नारायण धारिया से (उच्च वर्गों के प्रतिनिधियों के रूप में) प्रस्ताव पर बोलने का अनुरोध किया। उन दोनों ने संकल्प में अंतर्विवाह से संबंधित एक खंड को छोड़कर संकल्प को स्वीकार कर दिया। स्वयं इस प्रकार आश्वस्त होकर कि इसके पीछे जनसाधारण का समर्थन है, बैठक समाप्त होने पर सम्मेलन एक दल के रूप में उक्त टैंक पर गया। जुलूस बहुत शांतिपूर्ण था और सब कुछ शांतिपूर्वक हो गया। परंतु लगभग दो घंटे बाद कस्बे के कुछ दुष्ट नेताओं ने झूठी अफवाह फैला दी कि दलित वर्ग वीरेश्वर मंदिर में प्रवेश करने की योजना बना रहा है, जिस पर बांस के डंडे लेकर उच्च वर्गों की एक बड़ी भीड़ वहां एकत्र हो गई। वह भीड़ शीघ्र ही आक्रामक हो गई और सारा कस्बा शीघ्र ही उपद्रवियों की उमड़ती हुई भीड़ में बदल गया, और ऐसा प्रतीत होता था कि वे दलित वर्गों के खून के लिए वहां आए हैं।