खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 27

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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दलित लोग अपने गांवों को जाने से पहले खाना खाने में व्यस्त थे। जब उनमें से बहुत से लोग कस्बे को छोड़ कर जा चुके थे तो उपद्रवी उस रसोईघर में घुस गए जिसमें दलित वर्ग अपना खाना खा रहे थे। दोनों बलों के बीच एक नियमित युद्ध, हो जाता, परंतु दलित वर्गों को उनके नेताओं ने रोक लिया और इस प्रकार इससे एक बहुत गंभीर उपद्रव को टाल दिया गया। उपद्रवियों को उत्तेजना का कोई अवसर न मिला, इसलिए वे मुख्य गली में गश्त लगाने लगे और दलित वर्गों के उन सदस्यों पर हमला करने लगे जो छुटपुट दलों में अपने गांवों के लिए जा रहे थे तथा उन्होंने अनेक दलित वर्गों के घरों में अनधिकार प्रवेश किया ओर उन पर गंभीर हमला किया। कुल मिलाकर, दलित वर्गों में घायलों की संख्या 20 मानी जाती है। इस सब में दलित वर्गों का रवैया प्रशंसनीय था जबकि बहुत से उच्च वर्गों का रवैया ठीक नहीं था। वहां एकत्र दलित वर्गों की संख्या उच्च वर्गों से बहुत अधिक थी। परंतु चूंकि उनके नेताओं का उद्देश्य प्रत्येक बात को अहिंसक और नितांत संवैधानिक तरीके से करने का था, अतः वे दलित वर्गों की ओर से किसी भी हमले के प्रति कड़े हो गए। यह बात दलित वर्गों के पक्ष में बड़ा महत्व रखी है कि यद्यपि उनको बहुत उत्तेजित किया गया था, तथापि उन्होंने आत्मसंयम बनाए रखा। महाद सम्मेलन ने यह दिखा दिया कि उच्च वर्ग, दलित वर्गों को ऐसे प्राथमिक नागरिक अधिकारों का उपयोग करने की अनुमति भी नहीं देना चाहते जैसे सार्वजनिक जल सारणी से पानी लेना।

महाद और कोलाबा जिले में उच्च वर्ग के हिन्दुओं के व्यवहार का सर्वाधिक निन्दनीय पक्ष यह था कि विभिन्न गांवों को तत्काल संदेश भेजकर वहां के उच्च वर्ग के लोगों से कहा गया कि जैसे ही सम्मेलन के प्रतिनिधि अपने-अपने गांव लौटें वे उनको दंडित करें। इस आदेश के पालन में, सम्मेलन से लौटने वाले बहुत से महारों पर उनके अपने गांवों में, जहां उच्च सवर्ण हिन्दुओं की संख्या उनसे बहुत अधिक थी पहुंचने से पहले अथवा बाद में हमले किए गए। दलित वर्गों के नेताओं ने रक्षा के लिए अधिकारियों से अनुरोध किया है और डीएसपी सहित जिले के पदाधिकारी मौके पर जांच कर रहे हैं। तथापि, यह कहा जाना चाहिए कि यदि रेजिडेंट मजिस्ट्रेट ने दो मूल्यवान घंटे खराब न किए होते तो संभवतः दंगे को रोक दिया गया होता।”

”इस प्रकार महाराष्ट्र में दलित वर्गों का पहला बड़ा खुला सम्मेलन और उनका अपने नागरिक अधिकारों का दावा करने का पहला सार्वजनिक उद्यम सम्पन्न हुआ। यह सम्मेलन हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बड़ी तथा महत्वपूर्ण और युगान्तरकारी