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भारतीयों की नागरिक स्वतंत्रता
’’यह दिलचस्प बात है कि उनके लिये अस्पृश्यता और शोषण नागरिक अधिकारों का उल्लंघन था, परम्परागत रूप में नहीं, बल्कि इसलिये कि इनसे एक पूरे समुदाय की गरिमा का अतिक्रमण होता है। सिविल लिबर्टीज़ यूनियन के सचिव डॉ. के.बी. मेनन को जून 1937 में लिखा गया यह जवाब पढ़ने योग्य हैः
भीमराव आर. अम्बेडकर ’राजगृह’
एम.ए.पीएच.डी., डी.एस.सी. दादर, बम्बई-14
बैरिस्टर-एट-लॉ 8 जून, 1937
प्रिय श्री मेनन,
मुझे 19 मई, 1937 का आपका पत्र संख्या 998 और आपका पोस्टकार्ड भी प्राप्त हुआ, जिसमें आपने मुझे घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा है, जो कि इंडियन सिविल लिबर्टीज यूनियन की ओर से लंदन में ‘भारत मेंं नागरिक स्वतंत्रता’ पर हो रहे एक सम्मेलन में भारत की ओर से संदेश के रूप में पढ़ा जायेगा। मैं 25 मई को ही बम्बई पहुँचा हूँ और तभी मुझे आपके पत्र के विषय में ज्ञात हुआ, इसीलिये मैं पहले जवाब नहीं दे सका।
मैंने घोषणा-पत्र पढ़ लिया है और मुझे अफसोस है कि मैं इस पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता। आपने भारत सरकार की फ्रंटिअर पॉलिसी की निंदा की है। मेरी समझ से बाहर है कि यह भारतीयों की नागरिक स्वतंत्रता का मामला कैसे हो सकता है। दूसरी ओर, अस्पृश्यों के प्रति उच्च-जातीय हिन्दुओं द्वारा नियमित रूप से किये जा रहे अत्याचार तथा उत्पीड़न का इसमें कोई जि़क्र नहीं है, जो निस्संदेह भारतीयों की नागरिक स्वतंत्रता का विषय है।
आपका,
बी.आर. अम्बेडकर’’ ख्1,
- न्यायमूर्ति बी.आर. कृष्ण आय्यर, एक्सॉर्डियम पृ. VII .