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घटना थी। यह एक ऐसी घटना थी जिसने डॉ. अम्बेडकर के व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक तथा राष्ट्रीय पुनर्गठन की धारा दोनों को ही बदल दिया।’
अपने उद्धारक के नेतृत्व में, लाखों पददलितों, अमानवीय व्यवहार से त्रस्त और मूक लोगों ने भारत के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। उन्होंने न केवल अपनी चिरकालीन शिकायतों को व्यक्त किया बल्कि स्वयं ओजस्वी ढंग से उनके निवारण का उत्तरदायित्व भी लिया। उन्होंने अब साहस जुटाया तथा बहादुरी के साथ
खड़े होने और पारम्परिक व्यवहार समाप्त करने में उचित भावना दिखायी।
उनके शिक्षित नेताओं द्वारा प्रारंभ किए गए संघर्ष ने उनका मन-मोह लिया और उनमें आत्म-सम्मान तथा आत्म-उत्थान की ज्वाला को प्रज्वलित कर दिया। वे अब महाद में किए गए अपने अपमान और अवमान से व्यथित हो रहे थे। उन्होंने अपने मस्तिष्क को आत्म-उन्नति और आत्म-संस्कृति में ऐसे लगाया जैसा पहले कभी नहीं किया था। इस सम्मेलन के परिणामस्वरूप, अछूतों ने सड़ा-गला मांस
खाना छोड़ दिया और पशु शवों का चमड़ा उतारना छोड़ दिया तथा रोटी के टुकड़े मांगना छोड़ दिया।
उस चौदार टैंक का क्या हुआ जिसे अछूत हिन्दुओं के छूने से अपवित्र घोषित कर दिया था? रूढि़वादी और प्रतिक्रियावादी हिन्दुओं ने टैंक के शुद्धिकरण के प्रश्न पर विचार करने हेतु वीरेश्वर मंदिर में एक बैठक बुलाई। उनके पास किसी भी निन्दनीय और प्रदूषित सांसारिक वस्तु के शुद्धिकरण के लिए एक ही उपाय था। उनके लिए गाय के गोबर, गौ-मूत्र, दही और पानी का मिश्रण सभी प्रकार के पवित्रीकरण का प्रभावकारी उपाय था। तदनुसार, एक सौ आठ मिट्टी की हांडियों में टैंक से पानी लिया गया। दही, गाय के गोबर, दूध और गौ-मूत्र से भरी इन हांडियों को, चुने हुए ब्राह्मण पुजारियों द्वारा हवा को चीरने वाले मंत्रोच्चारण के बीच, टैंक में डुबाया गया। उसके बाद यह घोषणा की गई कि सवर्ण हिन्दुओं के उपयोग के लिए पानी शुद्ध कर दिया गया है। वास्तव में, मुसलमानों और ईसाइयों को शुद्धि करण के कार्य अथवा प्रक्रिया से कुछ लेना-देना नहीं था, क्योंकि उनकी दृष्टि में मनुष्य के स्पर्श से पानी अपवित्र नहीं होता। वे बिना किसी रोकटोक के पहले की तरह टैंक से पानी लेते रहे।’
चौदार टैंक के तथाकथित शुद्धिकरण के समाचार ने दलित वर्गों के दिलों को दुखाया और डॉ. अम्बेडकर के दिल को इतनी ठेस लगी कि वे नाराज हो गए और उन्होंने अपने लोगों के अधिकारों के समर्थन के लिए सत्याग्रह करने का निर्णय लिया। कुछ लोगों को भय था कि यह ”अधीर” उपचार बीमारी से भी बुरा है। डॉ.