276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दर अधिक मानी जायेगी;
( iv ) साहूकार तथा ऋणी के बीच खाते डी.ए.आर. अधिनियम में दिये गये नियमों के अनुसार होने चाहियें।
( v ) ऋणी के विरुद्ध किसी डिक्री का निष्पादन करते हुए अदालत देय राशि का भुगतान किस्तों में करने का निर्देश दे सकती है और ऋणी की सम्पत्ति के केवल उतने ही हिस्से की बिक्री का आदेश दे सकती है, जितना उसे डिक्री के निष्पादन के लिये पर्याप्त लगता हो।
पांचवें- यह विधेयक ऋणी द्वारा ऋण का भुगतान प्रांत से बाहर कहीं किये जाने के लिये की गई संविदा को अमान्य बताता है। इस का उद्देश्य साहूकार को इस अधिनियम के प्रावधानों को विफल करने से रोकना है।
बी.आर. अम्बेडकर
श्री लक्ष्मी नारायण प्रेस, 364, ठाकुरद्वार, बम्बई में मुद्रित पुस्तिका से पुनर्मुद्रित