282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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ग्वीयर अधिनिर्णय को डॉ. अम्बेडकर की चुनौती
’’राजकोट रियासत में फरवरी, 1939 से अशांति फैल रही थी, वहां
राजनीतिक सुधारों के लिए एक प्रबल आंदोलन चल रहा था। कांग्रेस अध्यक्ष
पद के चुनाव में सुभाष बोस से पराजित और निराश गांधी तुरंत राजकोट,
प्रकटतः रियासत की समस्या सुलझाने के लिए पहुंच गए, लेकिन ठीक त्रिपुरी
कांग्रेस अधिवेशन के समय संकट पैदा करने की अंदरूनी इच्छा से वहां गए थे
क्योंकि उस अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाष बोस करने वाले थे। उस रियासत
की सुधार समिति में शामिल न किए जाने के विवाद में दखल देने के लिए
डॉ. अम्बेडकर को स्थानीय दलित वर्गों द्वारा तुरंत बुलाया गया। इसलिए वे
राजकोट के लिए विमान से रवाना हुए और 18 अप्रैल की शाम को वहां के
शासक ठाकुर साहब से मिले, तथा रात में उन्होंने दलित वर्गों की एक सभा को
संबोधित किया और उनसे राजनीतिक अधिकारों के लिए अपना संघर्ष जारी रखने
का आग्रह किया।
अगले दिन डॉ. अम्बेडकर ने सुधार समिति में हरिजनों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न
पर गांधी से 45 मिनट बात की। उन्होंने राजकोट में एक साक्षात्कार में कहा कि
वे गांधी के साथ सभी मुद्दों पर चर्चा नहीं कर सके क्योंकि महात्मा को अचानक
बुखार आ गया था। तथापि उन्होंने बताया कि उनका यह सुझाव गांधी को मान्य
नहीं था कि उनका वैकल्पिक प्रस्ताव सर तेज बहादुर सप्रू जैसे संविधान विशेषज्ञ
के पास भेजा जाना चाहिए। अंततः में, गांधी अपनी अहिंसा पद्धति से हृदय परिवर्तन
करने में नाकाम रहे और वायसराय से बीच-बचाव करने की अपील करके उन्होंने
प्रपीड़क पद्धति का सहारा लिया। हृदय परिवर्तन और अहिंसा के सिद्धांत के अग्रदूत
महात्मा गांधी ने स्वयं सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उनकी अहिंसा अभी
संपूर्ण शक्ति के रूप में विकसित नहीं हो पाई है, और इस प्रकार उनके शब्दों में,
आशाओं को दफनाकर और क्लांत होकर वे राजकोट से चले गए।
तदॅनुसार, उसके कुछ दिनों बाद फेडरल कोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति सर मौरिस
ग्वीयर ने राजकोट रियासत में विवाद पर अधिनिर्णय दिया। डॉ. अम्बेडकर ने सर
मौरिस ग्वीयर द्वारा प्रयुक्त ’रिकमेंड’ अर्थात् सिफारिश शब्द की व्याख्या को चुनौती
दी। उन्होंने कहा कि ग्वीयर ने अपना फैसला इस आधार पर दिया है कि ’वर्तमान
निर्देश के प्रयोजनों के लिए कोई निर्णायक दृष्टांत नहीं है।’ डॉ. अम्बेडकर ने अपने
तर्क के समर्थन में दो नजीरें उद्धृत कीं -
- कीर, पृष्ठ 322-323 ।