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अंकित है - स्पष्ट है कि सिफारिश शब्द से ही यह साफ इंगित हो जाता है कि उस पर (प्रत्येक नाम पर) विचार करना होगा और ठाकुर साहब किसी भी नाम को, उदाहरणार्थ, इस आधार पर अस्वीकार कर सकते हैं कि जिन नामों की सिफारिश की गई है उनमें से कोई भी उपयुक्त व्यक्ति नहीं है, अयोग्य हैं या अवांछनीय हैं। सर मोरिस ग्वीयर ने इस दलील को नहीं माना।
उनका कहना है, ’’मेरे विचार में इसका सही अर्थ यह है कि ठाकुर साहब उन व्यक्तियों को नियुक्त करने का वचन देते हैं जिनकी सिफारिश श्री बल्लभ भाई पटेल करें तथा यह कि वह उन नामों को, जिन्हें वे अनुमोदित न करें, अस्वीकार करने का विवेकाधिकार अपने पास नहीं रखते। निःसंदेह वह उन सिफारिशों की आलोचना करने तथा उन पर पुनर्विचार करने के कारणों के बारे में आग्रह करने के हकदार हैं, लेकिन जब तक यह न दर्शा दिया जाए कि जिन व्यक्तियों की सिफारिश की गई है उनमें से कोई न तो रियासत का नागरिक है और न उसका कर्मचारी है, श्री बल्लभ भाई पटेल का ’’फैसला अंतिम होगा’’।
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इस निष्कर्ष के लिए और सर मौरिस ग्वीयर द्वारा ठाकुर साहेब की दलील अस्वीकार किए जाने के दो आधार हैं। सर मौरिस ग्वीयर के शब्दों में, पहला आधार यह है कि ’’ऐसा कोई सिद्धांत (जैसी कि दलील ठाकुर साहेब द्वारा दी गई है) केवल ’सिफारिश’ शब्द के प्रयोग पर आधारित नहीं हो सकता। इस शब्द से अपने आपमें इस प्रकार का कुछ आवश्यक रूप से विवक्षित नहीं होता। यह संदर्भ से ग्रहण किया जा सकता है और तदनुसार मामले की सारी परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।’’
दूसरा आधार यह है कि ठाकुर साहेब ने ’सिफारिश’ पर विचार करने की शक्ति अपने पास नहीं रखी थी अतः उनके पास श्री बल्लभ भाई पटेल द्वारा सिफारिश किए गए व्यक्तियों को अस्वीकार करने का कोई विवेकाधिकार नहीं था। सर मौ
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रिस ग्वीयर ने रेक्स बनाम गवर्नर्स आफ क्राईस्ट हॉस्पिटल
में रिपोर्ट किया गया) ] का हवाला दिया है। लेकिन उन्होंने इसका अवलंब नहीं लिया है। वह यह बिल्कुल स्पष्ट कर देते हैं कि उन्होंने उस मामले का हवाला क्यों दिया। उनका कहना है, ’’मैंने यह दर्शाने के लिए इनका हवाला दिया है कि ऐसा कोई एक सिद्धांत नहीं है जो उन मामलों को विनियमित करता हो जहां एक व्यक्ति सिफारिश करता है और दूसरा नियुक्ति करता है।’’ वस्तुतः उन्होंने अपना विनिश्चय इस आधार पर दिया कि वर्तमान निर्देश के प्रयोजनों के लिए कोई निर्णायक पूर्वोदाहरण नहीं है....।’’