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स्थितियों में ’सिफारिश’ निदेश के समान हो सकती है और विश्वास पैदा कर सकती है, फिर भी, यह शब्द लचीला होने के कारण, यदि उसका यह अर्थ वसीयत में किसी सकारात्मक प्रावधान से असंगत हो, तो उसे सिफारिश ही समझा जाना चाहिए, इससे अधिक नहीं।
उस मामले में, सिफारिश शुदा पक्ष को दिया गया माना गया हित अन्य शक्तियों से, जिनका प्रयोग न्यासियों द्वारा किया जाना था, असंगत था, और चूंकि वे शक्तियां सुस्पष्ट शब्दों में दी गई थीं इसलिए यह अभिनिर्धारित किया गया था कि, चूंकि दो प्रावधान एक साथ स्थिर नहीं रह सकते इसलिए......... लचीले शब्द को अनम्य शब्द के लिए रास्ता देना था।’’ तदनुसार यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस तथ्य के होते हुए भी कि सिफारिश आबद्धकर है, उसने बालकों पर वसीयती संरक्षक के नाते श्री कोट्टी की नियंत्रण शक्तियां नहीं छीनीं।
बाध्यकर निदेश नहीं
यह मामला निःसंदेह विश्वास विषयक है। लेकिन विश्वास कानूनी बाध्यता का ही दूसरा नाम है और चाहे कोई सिफारिश की बात करे जो विश्वास को जन्म दे अथवा कानूनी बाध्यता को उत्पन्न करे, यह एक ही बात है। ऐसी स्थिति में, यह निर्णय सुसंगत है, क्योंकि इसमें सिफारिश शब्द की व्याख्या से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। जैसाकि लार्ड डेनमेन के निर्णय से देखा जा सकता है, नियम यह है कि ’सिफारिश’ शब्द की व्याख्या ऐसे बाध्यकर निदेश के अर्थ में नहीं की जा सकती जिससे कोई छुटकारा न हो यदि ऐसी व्याख्या उस व्यक्ति में जिससे सिफारिश की जाए, निहित किन्हीं अन्य सकारात्मक शक्तियों के प्रयोग से असंगत हो जाती है।
अब, ठाकुर साहब बनाम बल्लभ भाई के मामले में, क्या यह नहीं कहा जा सकता
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कि ठाकुर साहब की स्थिति वही है जो श्री कोट्टी की थी ? क्या यह भी नहीं कहा जा सकता कि श्री कोट्टी की भांति ठाकुर साहब को भी क्राउन की हैसियत में, कुछ सकारात्मक शक्तियां प्राप्त हैं ? जैसे किसी व्यक्ति को किसी स्थान पर या से नियुक्त करने, नामंजूर करने या पद्च्युत करने की शक्ति, क्या यह कहना सही है कि ठाकुर साहब की वही स्थिति है जो श्री कोट्टी की थी तब कोई इस निष्कर्ष से कैसे बच सकता है कि ठाकुर साहब बनाम बल्लभ भाई के मामले का फैसला करने के लिए वही नियम लागू होगा जो नॉट बनाम कोट्टी वाले मामले में प्रतिपादित किया गया था ?