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सकता। राजकोट के संप्रभु शासक के नाते उनके द्वारा निष्पादित प्रत्येक दस्तावेज में ऐसे शब्दों का विद्यमान होना समझा जाएगा। चाहे वे शब्द उसमें विद्यमान हैं अथवा नहीं, अपने प्रसादपूर्वक समिति गठित करने की शक्ति उनकी प्रस्थिति का अभिन्न संयोग है तथा वह क्राउन के परमाधिकार के अंग स्वरूप उनके साथ-साथ चलती है। इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि ठाकुर साहब ने अपने पत्र में श्री बल्लभ भाई पटेल की सिफारिश को अस्वीकार करने की शक्ति अपने पास सुरक्षित नहीं रखी थी।
प्रश्न यह नहीं है कि ठाकुर साहब ने अस्वीकार करने की शक्ति अपने पास सुरक्षित रखी थी या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या ’सिफारिश’ शब्द में ऐसी कोई बात है जिसके बारे में यह कहा जा सके कि वह ठाकुर साहब को उनकी अस्वीकार करने की अंतर्निहित शक्तियों से वंचित करती है जो हमेशा उनमें निहित हैं और जिनके बारे में उनके लिए यह आवश्यक नहीं था कि वह अभिव्यक्त अनुबंध द्वारा उसे संरक्षित रखते। ऐसी स्थिति में, ’सिफारिश’ शब्द की व्याख्या उससे भिन्न नहीं की जा सकती जो उपरोक्त दो निर्णयों में की गई है।
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अन्य दो मामलों की भांति, इस मामले में, एक ओर ठाकुर साहब की सकारात्मक शक्तियां हैं जो एक अनम्य पद है तथा दूसरी ओर ’सिफारिश’ शब्द है जो हमेशा एक नम्य शब्द है। ऐसी स्थिति में, नियम के अनुसार, नम्य शब्द को अनम्य शब्द के सामने से हटना होगा। अभिप्राय यह है कि ’सिफारिश’ शब्द से निदेश या आबद्ध अभिप्रेत नहीं हो सकता।
सर मौरिस ग्वीयर द्वारा निर्देशित [ (1917) आई.के.बी. 19 में रिपोर्ट किया गया ] निर्णय, ऐसा लगता है, मेरे द्वारा निर्देशित दो निर्णयों से मतभेद रखता है। लेकिन सूक्ष्म विवेचन करने पर दिखाई देगा कि ऐसा कोई मतभेद नहीं है और निर्णय आसानी से प्रभेद्य है। 1917 आई.के.बी. वाले मामले में नियुक्ति प्राधिकारी मात्र एक नियुक्ति प्राधिकारी था, इससे ज्यादा नहीं। उसके पास कोई सकारात्मक शक्तियां नहीं थीं जिनके बारे में यह कहा जा सके कि उन्हें ..... ’सिफारिश’ शब्द की व्याख्या आबद्ध कर निदेश के अर्थ में किए जाने से अकृत होने का खतरा था।
मेरे द्वारा निर्देशित दो निर्णयों में प्रतिपादित सिद्धांत से यह प्रतीत होता है कि