25. जब बुद्ध ने पशु बली रोकी तो, उनके द्वारा गाय को पवित्र माना गया। - Page 313

296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खेतीहर गांवों ने चरागाही वर्ग के लोगों की सेवाएं हासिल कीं जिनकी जनजातियां आपसी झगड़ों के कारण बिखर गई थीं। इन लोगों को गांव के बाहर जमीन और मकान दे दिए गए तथा उनका मुख्य काम था कानून और व्यवस्था कायम रखना, जैसाकि आज भी उनका मुख्य कार्य है।

चरागाहीजन जातियों से गांवों की रक्षा करने का यह कार्य वे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी करते रहे। मुख्य ग्रामवासियों और गांव की सीमा पर रहने वाले ग्रामीणों के रक्षकों के बीच संबंध सामान्य मानव संबंध थे। उनमें अस्पृश्यता की कोई संकल्पना नहीं थी। तब यह कुरीति कैसे पैदा हुई ?

डॉ. अम्बेडकर के अनुसार, इसके लिए हमें भारत में बौद्ध धर्म के उद्भव पर दृष्टिपात करना होगा।

डॉ. अम्बेडकर का कहना है, बौद्ध धर्म पूरे देश में ऐसे छा गया जैसे कोई भी मनुष्य विजेता भारत के इतिहास में कभी नहीं रहा। कुछ पीढि़यों में ही प्रायः समूचे देश ने विशेषकर जनसाधारण और व्यापारी वर्ग ने बौद्ध धर्म अपना लिया।

ब्राह्मणवाद मृत्यु से भयाक्रांत था। वास्तव में, यदि ब्राह्मणों में चतुर अनुकूलनीयता न रही होती तो ब्राह्मणवाद समाप्त हो जाता। ब्राह्मण हर सामाजिक और धार्मिक संस्था को पूरी तरह छोड़ने को तैयार थे जिसके वे शताब्दियों से समर्थक रहे थे और जिसके बल पर वे युगों तक समृद्ध रहे। तभी ब्राह्मणवाद को बचाया जा सका। ब्राह्मणों ने क्या किया?

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बौद्ध धर्म की जनप्रियता

बुद्ध के तीन सौहार्दपूर्ण उपदेश थे जो जनसाधारण को प्रिय थे। सामाजिक समता का उनका उपदेश, चतुर्वर्ण प्रणाली समाप्त करने की उनकी मांग, उनका अहिंसा सिद्धांत और विशाल धार्मिक समारोहों तथा बलियों के लिए उनकी निंदा क्योंकि उन चीजों के कारण आम जनता निर्धन हो गई थी और उनमें धार्मिक समारोहों के प्रति विरोध पैदा हो गया था।

डॉ. अम्बेडकर के अनुसार, इस युग के ब्राह्मण शाकाहारी बिल्कुल भी नहीं थे। वे तो सबसे बड़े मांसाहारी थे, संभवतः देवताओं को प्रसन्न करने के लिए, लेकिन यथार्थ में वे अपनी स्वयं की मांसाहार की लालसा पूरी करने के लिए हजारों गायों और अन्य पशुओं की बलि देते थे।

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वैदिक बलि में निहित सत्य

इतनी भारी मात्रा में ब्राह्मणों की मांस की मांग ने किसानों को निर्धन बना