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इन्हीं कारणों से मैं महामहिम की सेवा में यह ज्ञापन इस प्रबल आशा के साथ प्रस्तुत कर रहा हूं कि महामहिम इस विषय में अत्यंत ध्यानपूर्वक, विनम्र और सहानुभूतिपूर्वक विचार कर निम्न ग्राम सेवकों को अत्यावश्यक और लंबे अरसे से प्रतीक्षित राहत मंजूर करने की कृपा करेंगे।
- पारश्रिमिक घटाया जाना
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|---|---|---|---|
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- सबसे पहले मैं, जूड़ी वसूलने के सवाल पर निवेदन करना चाहता हूं।
फिलहाल यह नीति केवल महारों की इनाम भूमि के बारे में लागू की गई
है। कालांतर में इसे अन्य विषयों में लागू किया जा सकता है। महारों
की इनाम जमीन पर जूड़ी अधिरोपित करने के मामले में मुझे वे कारण
पक्की तौर पर मालूम नहीं हैं जिनसे विवश होकर सरकार को महारों का
पारिश्रमिक घटाए जाने की नीति बनानी पड़ी। फिर भी ऐसा समझा जाता
है कि वे कारण दो हैं :-
- प्रथमतया, जूड़ी में बढ़ोतरी को सरकार इस आधार पर सही ठहराना चाहती
थी कि स्थानापन्न महारों की संख्या घट गई है। कहा जाता है कि महारों
द्वारा धारित इनाम जमीन पर जुड़ी बढ़ाकर पारिश्रमिक कम करने की नीति
स्थानापन्न महारों की संख्या कम करने की नीति का ही परिणाम है।
- शुरु में, मैं महामहिम का ध्यान इस तर्क में अंतर्निहित भ्रम की ओर आकृष्ट
करना चाहता हूं। वस्तुतः न तो साधारणतया और न ही किसी खास गांव
में स्थानापन्न महारों की वास्तविक संख्या कम हुई है। स्थानापन्न महारों
की संख्या उतनी ही है। फिर भी हुआ यह है कि वतन रजिस्टर ठीक
किए गए और तथ्यों के अनुरूप बनाए गए। एक समय हर गांव के वतन
रजिस्टर में दर्ज स्थानापन्न महारों की संख्या बहुत ज्यादा थी। महारों ने
उस पर कोई आपत्ति नहीं की थी। उसके दो कारण थे। पहला, रजिस्टर
में दर्शायी गई संख्या नाममात्र की थी और रोजाना की ड्यूटी पर वास्त
विक संख्या बहुत कम थी। दूसरे, रजिस्टर में महार का नाम दर्शाया जाना
उसके हित में था क्योंकि यह सबूत मिलता था कि वह वतनदार है और
वह वतन पद तथा वतन संपत्ति का हकदार है। महारों द्वारा चलाए गए
आत्मसम्मान आंदोलन के फलस्वरूप हर गांव में महारों और गांव वालों
के बीच परस्पर विरोध पैदा हो गया। ग्राम अधिकारी वतन रजिस्टर का
दुरुपयोग करने लगे और उन्होंने रजिस्टर में अंकित महारों की पूरी संख्या
सेवा के लिए मांगी, हालांकि रजिस्टर की महार संख्या के 1/10 महार