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व्यक्तियों के पक्ष में निर्धारण की मांग करने के रियासत के अधिकार को अन्य संक्रामित करने की अपनी शक्ति का बहुत अधिक उपयोग किया है और अन्य संक्रामित जमीनों का एक बहुत बड़ा वर्ग बना दिया जिसे आम तौर पर इनाम जमीन कहा जाता है। इन भूमिधारकों को इनामदार और वतनदार कहा जाता था। इन इनामों को चार वर्गों में रखा जाता था - (1) वैयक्तिक, (2) देवस्थान, (3) राजनीतिक और (4) गैर-राजनीतिक और ये सब वंशानुगत इनाम थे। सेवा के दृष्टिकोण से इन इनामों के दो वर्ग थे ः (क) वे इनाम जो राज्य के सेवा के पारिश्रमिक थे और (ख) वे इनाम जो दान (उपहार) थे जिसके लिए राज्य की सेवा करने की आवश्यकता नहीं थी। वैयक्तिक और देवस्थान इनाम गैर-सेवा इनामों के वर्ग के थे जबकि राजनीतिक और गैर-राजनीतिक इनाम सेवा-इनामों के वर्ग के थे।
- ब्रिटिश शासन के पहले 23 वर्षों के दौरान (1818-1841) इनाम के तौर पर भूमि-धारित करने के लिए व्यक्तियों द्वारा किए गए असंख्य दावे ब्रिटिश सरकार द्वारा ग्रहण नहीं किए गए। लेकिन 1841 में, इन दावों की जांच करने का मुद्दा हाथ में लिया गया। 1843 में दो व्यक्तियों की एक समिति दक्षिणी मराठा देश की अन्य संक्रामित जमीनों के बारे में जांच करने के लिए नियुक्त की गई। 1843 में नियुक्त की गई समिति द्वारा जांच नौ वर्ष तक अर्थात् 1852 तक चली थी जब उस समिति को बदलकर इनाम आयोग बना दिया गया। उसकी कार्यवाहियों को 1852 के अधिनियम सं. XI द्वारा कानूनी स्वरूप प्रदान किया गया। इस अधिनियम द्वारा सरकार को इनाम आयोग गठित करने के लिए सशक्त किया गया था। उसके अधीन सहायक आयुक्त को उन व्यक्तियों के हकों के बारे में अन्वेषण करने का अधिकार दिया गया था जो इनाम या जागीर धारित कर रहे थे अथवा सरकार के विरुद्ध उन पर कब्जे या उपभोग का या उनमें किसी हित का दावा कर रहे थे, अथवा भू-राजस्व अदा करने से छूट मांग रहे थे।’’ उस आयोग के कार्य बहुत धीमी गति से चले और उनका विस्तार गुजरात तक नहीं हुआ। अंततः आयोग द्वारा जांच पद्धति समाप्त की गई तथा उसके स्थान पर ’’संक्षिप्त व्यवस्थापन’’ की प्रणाली अपनाई गई जिसका विस्तार संपूर्ण प्रेजिडेन्सी तक होना था। संक्षिप्त व्यवस्थापन की यह प्रणाली दो अधिनियमों के जरिए कार्यान्वित की गई अर्थात् 1863 का अधिनियम सं. II जो दक्षिण के तथाकथित नये प्रांतों, खंडेश और दक्षिणी मराठा देश पर लागू होता था, और दूसरा 1863 का अधिनियम सं. VII जो गुजरात के तथाकथित पुराने प्रांतों और कोंकण पर लागू होता था।