27. वतनदार महारों, मेंगों आदि की शिकायतों से संबंधित अभ्यावेदन। - Page 328

311

हैं। उन्हें पेशवा सरकार द्वारा दिए गए अनुदानों को रखने के लिए

ब्रिटिश सरकार की अनुमति प्राप्त है तथा वे पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा

की बाध्यता के बिना उसका उपभोग करते हैं। उनके कारण सरकार

को प्रतिवर्ष 6,15,649 रु. 4 आने 10 पै. की हानि होती है।

( ii ) राजनीतिक इनामधारकों को ब्रिटिश सरकार द्वारा राज्य की सेवा

करने की बाध्यता से मुक्त किया गया है। लेकिन उन्हें दी जाने

वाली वेतन राशि बराबर कायम है। उनके वंशज पीढ़ी दर पीढ़ी

इन धनराशियों का उपभोग कर रहे हैं। उनके कारण सरकार को

प्रतिवर्ष 2,67,501 रु. 11 आने 7 पै. की हानि होती है।

( iii ) पेशवा सरकार के जिला अधिकारी, देसाई और देशपांडे ब्रिटिश

सरकार की किसी भी प्रकार की सेवा नहीं करते हैं। उनकी इनाम

जमीन जो उन्हें पेशवा सरकार द्वारा सेवा के पारिश्रमिक के तौर पर

दी गई थी, ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी रखी गई है परंतु जूड़ी के

रूप में छोटी-सी कटौती की शर्त के साथ। यह उन लोगों के लिए

केवल पेंशन नहीं थी जिनके साथ ब्रिटिश सरकार द्वारा आजीवन

व्यवस्थापन किया गया था। उनके वंशजों के लिए भी यह वंशानुगत

पेंशन हो गई है। किन्तु वे इस अनुदान की किसी भी तरह मांग नहीं

कर सकते। यहां भी वार्षिक हानि 8,14,545 रु. 8 आने 4 पै. है।

( iv ) वे ग्राम सेवक, जो ग्राम समाज एवं सरकार के लिए बेकार हो गए

थे, सेवा की बाध्यता से मुक्त कर दिए गए थे। लेकिन उनका पूरा

वेतन बहाल नहीं किया गया था। इनाम भूमियां उनके पास ही रहीं

और कुछ मामलों में पूरे निर्धारण का भुगतान किया जाता था तथा

दूसरे मामलों में, निर्धारण आधी दर से भुगतान किया जाता था।

  1. इन दृष्टांतों से पता चल जाएगा कि बम्बई सरकार ने वतन और इनाम संपत्ति को हमेशा एक विशेष वर्ग के अंतर्गत माना है। उसने इसे कभी भी सेवा के बदले पारिश्रमिक का विषय नहीं माना और उन मामलों में भी, जिनमें इसका स्वरूप पारिश्रमिक का था ’’काम नहीं वेतन नहीं’’ का सिद्धांत कभी लागू नहीं किया।

  2. महार वतन भूमियों पर जूड़ी वसूलने के मामले में अब अपनाई गई नीति पूरी तरह अलग है जिसका कोई पूर्वोदाहरण नहीं है।

  3. महारों की वतन सम्पत्ति को मात्र पारिश्रमिक के रूप में मानने को घोर